वाराणसी। इन दिनों काशी में मन्दिर बचाओ आन्दोलनम् के अन्तर्गत ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारका शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के शिष्य प्रतिनिधि स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती जी केदार घाट के बगल में गंगा किनारे बारह दिनों के पराक व्रत पर बैठे हैं । इस व्रत के दौरान वे लगातार बारह दिनों तक केवल जल पर निर्वाह कर रहे हैं । ऐसे में लोगों के मन में इस व्रत के बारे में जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हो गई है ।
लोग एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि आखिर क्या है यह पराक व्रत? और किसलिए किया जाता है ?
इसे जानने के लिए हमें भारत के उस कालखंड में जाना होगा जब लोग शास्त्रों के अनुसार जीवन व्यतीत करते थे । अधिकांश लोग तो अपराध जिसे शास्त्र की भाषा में पाप कहा जाता है , करते ही नहीं थे । यदि किसी से कोई दोष पाप जाने अनजाने हो भी जाता था तो वह स्वयं राजा या धर्माचार्य के पास जाकर अपना पाप बताकर उसका दण्ड स्वीकार करता था । बताये गये दण्ड को भोगकर वह स्वयं को निष्पाप बना लेता था । शास्त्रों की भाषा में इस कृत्य को प्रायश्चित्त कहा गया है ।
पाप के बारे में इसी तरह की अवधारणा विभिन्न धर्मों, युगों और देशों में विभिन्न प्रकार से रही है ।
पर आजकल पूर्व और पश्चिम के बहुत से व्यक्ति पाप के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते । ‘सिन एण्ड दि न्यू साइकोलोजी’ नाम की किताब में बारबोअर ने लिखा है कि आजकल के जीवन में ईसाइयत का प्रभाव बढ़ता जा रहा है और ईसाई भावना में पाप नाम की कोई वस्तु नहीं है । किसी व्यक्ति का जीवन दुष्कर्म से भरा हो सकता है पर वह मानसिक कारणों से है और इसे सम्भवतः मनोवैज्ञानिक चिकित्सा से दूर किया जा सकता है । भारत में भी नास्तिक चार्वाक इसी तरह का विचार व्यक्त करते रहे हैं ।
पर भारत में सदा से पाप के अस्तित्व को स्वीकार किया गया है । यह माना जाता है कि धर्म ईश्वर की आज्ञा है और इसका उल्लंघन पाप । पाप के कई भेद हैं– अतिपाप वह है जिससे बड़ा कोई और पाप न हो । महापाप किसी के प्राण हरण से जुडा है । पातक वह है जो महापातकों के समान हो और प्रासंगिक पाप संसर्ग से होता है ।
साधारण पापों को उपपातक की संज्ञा दी गई है । जातिभ्रंशकर, संकरीकरण, अपात्रीकरण, मलावह और प्रकीर्णक आदि पापों की अन्य अनेक श्रेणियाँ भी हैं ।
इन पापों और इनके फलों को कम करने के लिए भी धर्म शास्त्रों में व्यवस्था दी गई है ।अपने अपराध को स्वयं स्वीकार कर लेना, पश्चात्ताप करना, प्राणायाम, होम, जप, दान, तीर्थ यात्रा और उपवास उनकी श्रेणियाँ हैं ।
इनमें उपवास भी अनेक तरह के हैं । जिनमें कई तरह के सान्तपन, चान्द्रायण, और कृच्छ्र के अतिरिक्त अघमर्षण, एकव्रत,गोव्रत,कूर्च,प्राजापत्य,याम्य,यावक,वज्र,सोमायन और पराक आते हैं ।
इनमें पराक व्रत अत्यन्त कठिन माना जाता है । मनुस्मृति 11/215, बोधायन धर्म सूत्र 4/5/16, याज्ञवल्क्य स्मृति 3/320, शंखस्मृति 18/5, अत्रि स्मृति 28, अग्नि पुराण 170/10, विष्णु पुराण 46/18 और स्कन्द पुराण के काशीखण्ड में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है ।
मनुस्मृति कहती है –
यतात्मनोऽप्रमत्तस्य द्वादशाहमभोजनम् ।
पराको नाम कृच्छ्रोऽयं सर्वपापापनोदनः ।
अर्थात् इन्द्रिय निग्रह पूर्वक सावधान मन से निरन्तर बारह दिनों तक भोजन का परित्याग कर किये गये इस व्रत से सभी प्रकार के यानी छोटे बड़े सभी पाप नष्ट हो जाते हैं ।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द कहते हैं कि शास्त्र कहता है कि प्रायश्चित्त न करने से पापी को दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं । ‘पापकृद्याति नरकं प्रायश्चित्तपराङ्मुखः ।’ अतः काशी में पौराणिक मन्दिरों को ढहाये जाने और देवमूर्तियों को अपमानित और गायब कर दिये जाने तथा अनेकों मन्दिरों में तालाबन्दी कर देवपूजा के बाधित कर दिये जाने से जो पाप हुआ है उसका प्रायश्चित्त आवश्यक था ।
यदि हम प्रायश्चित्त न करते तो पूरी काशी पर इसका दोष आता और सबको दैवदण्ड भोगना पड़ता । शंकराचार्य जी के शिष्य और प्रतिनिधि और काशी का जिम्मेदार वासी होने के नाते हमने सनातनी समाज की रक्षा के लिए यह पराक व्रत अपनाया है । साथ ही मन्दिरों की मर्यादा रक्षा का प्रयत्न भी कर रहे हैं ।

