शर्मनाक ही नही बल्की हृदय विदारक ही कहलायेगी यह आंखों देखी दास्तान।
प्रयागराज ( श्री बी के सिंह /अनुराग शुक्ला ) एक तरफ माननीय, योगी जी का कहना कि कोई मजबूर, गरीब, लेबर, पैदल घर न जाए दूसरी तरफ रोज़ रात में सैकड़ो ऐसे यूवाओं को देख रहा हूँ जो ग्रुप बना कर पैदल अपने गांव की ओर महामारी से बचने के लिए इस प्रयाग की सड़को पर दिखाई देते हैं। पसीने में तर ये अपनी जान बचाने के लिए अपने अपने गांव की ओर जा रहे हैं।

प्रशाशन आंखे बंद किये बैठा है। एक्का दुक्का मोटरसाइकिल सवारों से ये रोक कर पूछते हैं भैया आज़मगढ़ का रास्ता कौन सा है, कानपुर की तरफ जाने का रास्ता कौन सा है। यह सब तब जब ये सैकड़ों किलोमीटर का रास्ता पैदल चल कर प्रयागराज पहुंचते हैं।
मैं रोज़ देख रहा हूँ कि गोदी मीडिया प्रशाशनिक व पुलिस अधिकारी जो लगता ही सिर्फ दिन में ही शहर में निकलते हैं शायद इस दर्दनाक असलियत से अनिभिज्ञ हैं। एक दो अखबारों ने खबर छापी भी थी लेकिन लेखनी में कोई सरकार या प्रशासन की आलोचना नही थी।
अखबारों ने तो करीब करीब आलोचना करना बंद कर दिया है। करेगा तो विज्ञापन मिलना बंद हो जाएगा। अखबार मालिकों की फैक्टरियां हैं बड़े बड़े बिज़नेस हैं इनकम टैक्स का रेड हो जाएगा। अब मीडिया की गाइड लाइन सरकार तय कर रही है जो कि इस आज़ाद देश में कभी नही हुआ। लोकतंत्र का गला पूरी तरह घुंट चुका है।

कुछ अच्छे पत्रकारों को छोड़ कर कई पत्रकार गोदी मीडिया की टीम में शामिल हो गए हैं। और वो फिर करें भी तो क्या करें अगर सच्चाई वाला वीडियो बना कर ले ayenge तो चैनल चलाएगा नही।

निकाल दिए जाएंगे, सैलरी मिलना बंद हो जाएगी व सड़क पे आ जाएंगे। कितने पत्रकार निकाले जा चुके हैं। अखबार मालिकान सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ा रहे हैं मजीठिया कमीशन की रिपोर्ट पत्रकारों के हक में लागू करने के मुद्दे पर।
Lockdown के बाद से किसी भी शाम या रात में मुझे एक भी अधिकारियों की टीम नही दिखी, जो रुक कर इन असहाय नौजवानों जिसमे बच्चे व औरतें भी होती हैं से पूछें कहाँ जाना है, रुको हम बस मंगवाते हैं। हाँ छात्रों के लिए प्रशाशन ने कुछ दिन तक बसों का इंतेजाम ज़रूर करवाया लेकिन असहाय गरीबों को छोड़ दिया भूखे प्यासे पेट पैदल सड़कों पर रात रार भर चलने को।
प्रशाशन को इस बात की चिंता है कि दुकानें जिन्हें खोलने की छूट है वो टाइम पर बंद कर दें। इसके लिए गाड़ी में घूम कर जनता के पैसों का पेट्रोल फूक कर वो announce करते जरूर दिखते हैं की दुकान बंद कीजिए टाइम हो गया। देखिए ये कारवां कब तक चलेगा।
इन मजदूरों को तो वो भी नही पूछ रहे हैं जो सुबह शाम गरीब बस्तियों में जाकर राशन आज कल बांट रहे। इनमें से कुछ को छोड़ के वो छपास के रोगी हैं जो राशन बांटते, या फ़ूड पैकेट बांटते हुए अपने वीडियो बनवाते है जनता को ये दिखाने के लिए की वो कितने बड़े दानवीर हैं। जब कि असली मददगार तो वो होता है जो दाहिने हाथ से किसी को कुछ दे तो बाएं हाथ को पता नही होना चाहिए। लेकिन ऐसा अगर करेंगे तो वाह वाही कैसे मिलेगी।
कोरोना वारियर्स के ऊपर तो फूल बरसाए जा रहे हैं। बहोत अच्छी बात है। हौसला अफजाई होती है ऐसा करने से। सेवा में लगे लोग मोटीवेट होते हैं।
लेकिन इन सैकड़ों किलोमीटर चलने वाले कोरोना वारियर्स को तो एक बोतल कोई पानी तक देने वाला नहीं है। जेब में इनके अगर पैसे हैं भी तो ये खाना खरीद के भी नही खा सकते हैं क्यों कि होटल व ढाबे हाइवेज पर बन्द हैं। आस पास के गांव वाले इन्हें कोरोना के डर से घुसने नही देते ऐसा कईयों से बात कर पता चला।
कितनो के हाथ में प्लास्टिक की खाली बोतल दिखती है कहीं अगर सड़क पे नल मिल जाता है तो खुशी से झूम उठते हैं। भर पेट पानी भी नही पीते इस डर से की अगर खत्म हो गया तो न जाने कितने किलोमीटर दूर किस शहर में फिर कोई नल शायद दिख जाए। वैसे भी सड़क चौड़ी कारण में सड़क के नल हटाये जा चुके हैं।
एक नई बात।
ये अगर सही है तो अंधेर ही कहलायेगा। सुनने नें आया है कि जो कुछ ट्रैन 12 मई से चलेंगी उनमें सिर्फ वही चढ़ पाएंगे जिनका पक्का रिजर्वेशन होगा। मतलब ये की इस स्थिति में ये गरीब पैदल चलने वाले ट्रैन से भी वंचित रह जाएंगे।ये है वो सरकार जिसे बड़े अरमानो से जनता ने सत्ता दिलाई थी।



