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सोमवती अमावस्या पर चतुर्दशी यानी मास शिवरात्रि का संयोग भी- शंकराचार्य स्वामी महेशाश्रम

( अनुराग शुक्ला )प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार ) । इस बार माघ मेले में सोमवार को लगने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है। इस अमावस्या का धार्मिक दृष्टि से बड़ा ही महत्व बताया गया है। अखिल भारती दंडी संन्यासी परिषद के संरक्षक शंकराचार्य स्वामी महेशाश्रम ने बताया ऐसी मान्यता है कि इस अमावस्या के दिन व्रत पूजन और पितरों को जल तिल देने से बहुत ही पुण्य की प्राप्ति होती है। सुहागिनों के लिए तो इस व्रत का खास ही महत्व है। कहते हैं कि इस दिन व्रत करने और शिव पार्वती की पूजा करने से सुहाग की आयु लंबी होती है और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। दांपत्य जीवन में स्नेह और सद्भाव बढ़ाने के लिए भी सुहागिनों को सोमवती अमावस्या का व्रत पूजा करना चाहिए। शंकराचार्य स्वामी महेशाश्रम ने कहा साल 2022 में कुल 13 अमावस्या तिथि हैं। जिनमें केवल दो ही सोमवती अमावस्या है। साल की पहली सोमवती अमावस्या 31 जनवरी को है और दूसरी ज्येष्ठ मास में 30 मई को। पंचांग गणना के अनुसार 31 जनवरी को दोपहर में 2 बजकर 19 मिनट तक चतुर्दशी तिथि है। इसके बाद से अमावस्या तिथि लग जाएगी। शास्त्रों में कहा गया है कि सोमवार को कुछ समय के लिए ही अमावस्या तिथि होने पर इसे बेढ़ी और सोमवती अमावस्या मानते हैं। 1 फरवरी को अमावस्या तिथि सुबह 11 बजकर 16 मिनट तक है इसलिए 31 जनवरी को भी पितृ कार्य के लिए अमावस्या मान्य है। शंकराचार्य स्वामी महेशाश्रम ने बताया कि सोमवती अमावस्या पर चतुर्दशी यानी मास शिवरात्रि का संयोग भी कुछ समय के लिए बना हुआ है। इस दिन 10 बजकर 25 मिनट से सिद्धि योग भी लग जाएगी। ऐसे में इस दिन सुबह पैरों के नीचे आक के पत्ते, सिर और माथे पर रखकर भगवान शिव का ध्यान करते हुए स्नान कीजिए।

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