” ममता बनाम मोक्ष “

(अनुराग दर्शन डॉट कॉम) (डॉ निधि खन्ना )।
पूजा की थाली हाथ में लिए रम्मो देवी तेजी से रास्ते के छोरे को डांटे हुएं बोली,”चल हट परे ! देखता नही, पूजा को जा रही हूं। सब अपवित्र कर देगा” और राम राम जपती तेजी से मंदिर की ओर बढ़ गई। वह प्रतिदिन पैदल स्नान को जाती और फिर लौट कर अपने कुल देवता के मंदिर में पूजा अर्चना करके ही घर में प्रवेश करती।
रम्मो देवी के पांच बेटे थे। एक बेटा इंजीनियर था, एक बैंक में, एक का कपड़े का व्यापार, एक फौज में और सबसे छोटा अभी ही डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी करके आया था। कुल मिलाकर सब बच्चे अपनी मेहनत के बलबूते अच्छा कमा खा रहे थे । इतनी साधारण सी क्लर्क की नौकरी में सब बच्चो को इतना पढ़ना लिखना आसान कहा था। पर विशंभर दास जी और रम्मो देवी ने अपने बच्चो को इस गरीबी में भी शिक्षा की दौलत से मालामाल कर दिया था।
जब से रम्मो देवी ब्याह के आई थी उन्होंने बस अपने पति परमेश्वर और बच्चो के अलावा पूजा पाठ में ही सारा ध्यान लगाया था। परलोक सुधारने की बड़ी इच्छा थी उनकी। तिस पर संस्कार भी ऐसे थे की “जिसे मरने पर गंगा का किनारा मिले, वह सीधे स्वर्ग जाता है और मोक्ष पाता है” तो बस यही बात मन में बैठी हुई थी। इसलिए हर बात पीछे बस एक ही बात बोलती कि, “अरे ! अब प्रयाग में ब्याही हूं तो इत्ता तो नसीब में लिखा ही होगा ऊपर वाले ने की गंगा का किनारा मिल जाए”।
समय तेजी से बीता और रम्मो देवी को कैंसर हो गया। तबियत गिरने लगी लेकिन पूजा पाठ कम नही हुआ । देखते-देखते जेठ का महीना भी आ पहुंचा, जब लू और गर्मी अपने पूरे उफान पर होती है । सारे इलाज और कोशिशों के बाद भी अब उनका अंत समय करीब था। तभी रम्मो देवी ने बड़ी बहू को बुलाकर कहा, “देख बहू ! अब खाना सुबह सुबह जल्दी बना कर बच्चन को जल्दी ही खिला दिया करना। जाने कब मेरी आंख बंद हो जाए। फिर बच्चे दिन भर को भूखे रह जायेंगे।”
“कैसी बातें करती हैं अम्मा! आपको कुछ नही होगा” बहू ने आखों के आंसू पीते हुए सास को ढांढस बंधाया। रम्मों देवी मुस्कुरा उठीं। आज उनकी सांस धौकनी सी चल रही थी। दिन कटना मुश्किल लग रहा था। बच्चे, बहुएं, पोते पोतियां और विशंभर दास , सभी उनको घेरे आस-पास बैठे थे। किसी भी समय कुछ भी होने जैसा माहौल था। तभी रम्मो देवी ने पति को इशारे से पास बुलाया और कहा, “सुनो जी, मुझे जमुना जी वाले घाट ही ले जाना। गर्मी बहुत है और गंगा जी जात जात बहुत समय लग जाई बच्चन को । जमुना जी ही ठीक रही इतनी गर्मी में”।
विशंभर दास जी हत-प्रभ होकर पत्नी को देखने लगे। उनकी आखों से आसूं और रम्मो जी के प्राण एक साथ ही निकल पड़े।



