Latest

मुद्रित प्रपत्र को भरकर ने जारी करें सम्मन

प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पहले से मुद्रित प्रपत्र के खाली स्थान को भरकर न्यायिक विवेक का प्रयोग किए बगैर जारी सम्मन आदेश विधि विरुद्ध और न्यायिक मानदंडों के विपरीत है।

कोर्ट ने कहा कि ऐसी प्रथा तत्काल रोक देना चाहिए। ऐसे आदेश जारी करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने गाजियाबाद के कविनगर थानाक्षेत्र के आशू रावत की याचिका पर दिया है।

न्यायमूर्ति शमशेरी ने हिन्दी में पारित निर्णय में कहा कि अपराध का संज्ञान लेना और अभियुक्त को सम्मन जारी करना गंभीर न्यायिक प्रक्रिया है।

इसके आदेश में यह दिखाई देना चाहिए कि मजिस्ट्रेट ने तथ्यों व कानूनी प्रावधानों के आधार पर आदेश पारित किया है।

कोर्ट ने अपने फैसले में सर्वोच्च अदालत द्वारा स्थापित विधि सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा है कि मजिस्ट्रेट को आदेश पारित करते समय अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग करना चाहिए।

पहले से मुद्रित आदेश की खाली जगह भरकर दिए गए आदेश को विवेक का प्रयोग कर पारित आदेश नहीं माना जा सकता।
इसी के साथ कोर्ट ने गाजियाबाद के न्यायिक मजिस्ट्रेट के यहां से 20 जून 2020 को जारी सम्मन को निरस्त कर दिया और पत्रावली वापस करते हुए नए सिरे से आदेश करने का निर्देश दिया है।

याची के खिलाफ सूचना तकनीकी कानून की धारा 67 व 67 ए के तहत इस्तगासा दाखिल किया गया है, जिस पर मजिस्ट्रेट ने पहले से मुद्रित आदेश के खाली स्थान भरकर सम्मन जारी किया था।

याचिका में इस्तगासा व सम्मन दोनों को अवैध करार देते हुए रद्द करने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग कर सम्मन आदेश को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है।

Related Articles

Back to top button