जबरन अंतिम संस्कार मानवाधिकारों का उल्लंघन
हाथरस कांड: अंतिम संस्कार पर हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी
डीएम के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का सरकार को निर्देश
एडीजी ला एंड आर्डर प्रशांत कुमार ने हाईकोर्ट में मानी गलती
( अनुराग शुक्ला )
प्रयागराज ( अनुराग दर्शन समाचार )। बहुचर्चित हाथरस कांड में परिवार की मर्जी के बिना रात में मृतका का अंतिम संस्कार किए जाने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने तीखी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि बिना धार्मिक संस्कारों के युवती का दाह संस्कार करना पीडि़त, उसके स्वजन और रिश्तेदारों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है। इसके लिए जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई करने की आवश्यकता है। कोर्ट ने इस मामले में मीडिया, राजनीतिक दलों व सरकारी अफसरों की अतिसक्रियता पर भी नाराजगी प्रकट करते हुए उन्हें इस मामले में बेवजह बयानबाजी न करने की हिदायत दी है।
हाथरस कांड में रात में मृत पीडि़ता का अंतिम संस्कार किए जाने को लेकर जस्टिस पंकज मित्थल और जस्टिस राजन रॉय की बेंच ने सुरक्षित किए गए अपने आदेश को मंगलवार को जारी किया। कोर्ट ने राज्य सरकार को पीडि़ता के परिवार को पूरी सुरक्षा देने का निर्देश दिया है। साथ ही एसआईटी और सीबीआई को भी मामले की जांच में गोपनीयता बरतने का आदेश दिया है। हाई कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया की शुचिता के लिए सरकार को हाथरस के डीएम प्रवीन कुमार लक्षकार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि एसपी को निलंबित किया गया है। डीएम के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई, जबकि उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि मृतका का रात में दाह संस्कार करने का निर्णय उनका अलीगढ़ के कमिश्नर, आगरा के एडीजी, आईजी अलीगढ़ व एसपी हाथरस का सामूहिक फैसला था। ऐसे में सिर्फ एसपी के खिलाफ ही कार्रवाई क्यों की गई।
हाईकोर्ट ने एडीजी ला एंड आर्डर प्रशांत कुमार व डीएम प्रवीन कुमार लक्षकार को इस बात के लिए लताड़ लगाई कि उन्होंने दुराचार जैसी गंभीर मामले में मेडिकल रिपेार्ट को लेकर बयानबाजी की और कहा कि पीडि़ता के साथ दुष्कर्म नहीं हुआ था। कोर्ट ने एडीजी से पूछा कि आप दुष्कर्म की परिभाषा जानते हैं, इस पर प्रशांत कुमार ने अपनी गलती भी मानी।
कोर्ट ने कहा कि तथ्य यही है कि परिजन के बार-बार के अनुरोध के बावजूद मृतका का चेहरा उन्हें नहीं दिखाया गया। इस प्रकार गरिमापूर्ण ढंग से अंतिम संस्कार के अधिकार का उल्लंघन किया गया। कोर्ट ने कहा कि हमारे समक्ष महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि परिवार को बिना धार्मिक क्रियाकलाप के परिवार को चेहरा दिखाए बिना आधी रात में अंतिम संस्कार करके क्या संविधान में प्रदत्त जीवन के अधिकार व धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन किया गया है। यदि ऐसा है तो यह तय करना होगा कि पीडि़ता के परिवार की क्षतिपूर्ति कैसे की जा सकती है।
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…तो बैंक में जमा करें मुआवजा
प्रयागराज। अदालत ने कहा कि सरकार ने पीडि़ता के परिवार के लिए मुआवजे की घोषणा की है लेकिन सम्भवत: वह उन्हें स्वीकार नहीं है क्योंकि परिवार के एक सदस्य ने कहा कि मुआवजा अब किसी काम का नहीं। फिर भी मुआवजे का प्रस्ताव परिवार को जल्द से जल्द दिया जाए और यदि वे लेने से इनकार करते हैं तो जिलाधिकारी किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में ब्याज मिलने वाले खाते में इसे जमा कर दें, जिसके उपयोग के बारे में हम आगे निर्देश दे सकते हैं। कोर्ट ने दो नवंबर को सचिव स्तर के एक अधिकारी, एडीजी लॉ एंड आर्डर व तत्कालीन एसपी विक्रांत वीर को भी तलब किया है।
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जिम्मेदारी समझे मीडिया
प्रयागराज। कोर्ट ने मीडिया की भूमिका को लेकर भी कई सख्त हिदायतें देते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने की उसकी कोई मंशा नहीं है, पर उसे अपनी जिम्मेदारी को भी समझना होगा। मीडिया ट्रायल पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह ध्यान रखना चाहिए कि कहीं युवती के परिवार व अभियुक्तों के अधिकारों का उल्लंघन न हो। ट्रायल पूरा होने से पहले अभियुक्तों को दोषी नहीं ठहराना चाहिए। इसी तरह किसी को पीडि़ता के चरित्र हनन में भी शामिल नहीं होना चाहिए।




