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13 साल फाइलों में क्यों दबी रही ध्वस्तीकरण नोटिस

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पीडीए के क्रियाकलाप पर उठाए गंभीर सवाल

तीन साल से अधिक समय से लंबित ध्वस्तीकरण आदेशों का मांगा ब्यौरा

प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। विजय कांप्लेक्स के ध्वस्तीकरण मामले में प्रयागराज विकास प्राधिकरण (पीडीए) की हालत सांप छछूंदर जैसी हो गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज्ञानपुर के विधायक विजय मिश्र के अल्लापुर स्थित शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में अवैध निर्माण को गिराने के ध्वस्तीकरण आदेश और नोटिस जारी होने के 13 साल बाद उस पर अमल करने की कार्रवाई पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि ध्वस्तीकरण आदेश जारी होने के बाद उस पर क्रियान्वन न होना गंभीर चिंता का विषय है। इससे शहरी विकास अधिनियम का सुनियोजित विकास का उद्देश्य विफल होता है। साथ ही पीडीए से तीन साल से अधिक समय से लंबित ध्वस्तीकरण आदेशों का ब्योरा तलब किया है।
हाईकोर्ट ने आदेश पर वर्षों तक अमल करने की बजाय उसे फाइलों में दबाए रखने के चलन पर टिप्पणी करते हुए कहा कि क्या यह इकलौता मामला है या सामान्य रूप से ऐसा ही होता है। और यदि यही सामान्य चलन है तो इसके लिए अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि सरकार और प्राधिकरण ऐसा तंत्र विकसित करें जिससे अंतिम रूप ले चुके ऐसे ध्वस्तीकरण आदेशों पर एक तय समयसीमा में क्रियान्वयन किया जा सके।
यह आदेश न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार मिश्र ने पीडीए की याचिका पर दिया है। प्राधिकरण ने ज्ञानपुर के विधायक विजय मिश्र के शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में अवैध निर्माण के ध्वस्तीकरण आदेश के खिलाफ दाखिल अपील पर कमिश्नर प्रयागराज के आदेश को याचिका में चुनौती दी है। पीडीए का कहना है कि कमिश्नर ने अपने आदेश में प्राधिकरण का ध्वस्तीकरण नोटिस विजय मिश्र को तामील कराने पर संदेह जताया है, जो गलत है। इस पर कोर्ट ने कहा कि कमिश्नर ने अपने आदेश में प्राधिकरण के कागजात पर गौर नहीं किया कि नोटिस तामील कराया गया है। इसलिए इस पर संदेह व्यक्त करना न्यायसंगत नहीं है।
कमिश्नर ने अपने आदेश में नोटिस तामील कराने के नियम का पालन किस प्रकार नहीं किया गया, इसकी कोई चर्चा नहीं की और न ही संदेह व्यक्त करने का कोई कारण स्पष्ट किया है। कोर्ट ने कहा कि याची ने स्वयं अवैध निर्माण गिराने और भवन को वापस आवासीय स्थिति में लाने का हलफनामा दिया है इसलिए इस मुद्दे पर और अधिक चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि इस अवैध निर्माण के लिए 12 दिसंबर 2007 को ध्वस्तीकरण आदेश और नोटिस जारी होने के बाद इसे फाइलों में दबा दिया गया। जबकि प्राधिकरण का कहना है कि नोटिस तामील कराया गया और ध्वस्तीकरण में कोई वैधानिक बाधा नहीं थी। दूसरी तरफ कमिश्नर के आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 13 वर्षों में इस आदेश के पालन के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। पीडीए के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि आदेश के बाद उसे फाइलों में क्यों दबा दिया गया।

आड़े नहीं गैंगस्टर कोर्ट का आदेश

प्रयागराज। हाईकोर्ट ने विवादित संपत्ति के स्वरूप में बदलाव न करने के गैंगस्टर कोर्ट के 28 अक्टूबर के आदेश का जिक्र करते हुए कहा कि दोनों प्रक्रिया अलग अलग है। गैंगस्टर कोर्ट का आदेश ध्वस्तीकरण आदेश के अनुपालन में आड़े नहीं आएगा। गैंगस्टर एक्ट में संपत्ति अटैच होने की आड़ में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई से नहीं बचा जा सकता। कोर्ट ने कहा गैंगस्टर कोर्ट को सक्षम प्राधिकारी के आदेश में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।

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