भौंरा भी एक अजीब जीव होता है जो किसी भी फूल से रस लेने में कोई भेद नही करता

( अनुराग दर्शन डॉट कॉम )भौंरा भी एक अजीब जीव होता है जो किसी भी फूल से रस लेने में कोई भेद नही करता, कभी गुड़हल , कभी गुलाब तो कभी कोई और फूल।
पुराने ज़माने का एक गीत भी है जिसमे भौंरे को नादान बताया गया है। बगियन का मेहमान बताया गया है और इसी गीत में भौंरे को कलियों के प्रति असंवेदनशील कहा गया है। वो कलियों की मुस्कान तक भी नही समझता या उनको भाव नही देता।
कभी ऐसा हाल आपको देश कुछ राजनीतिज्ञों का नही लगता जो नादान तो कदाचित नहीं हैं पर कलियों जैसी स्थिति इस देश की भोली और मासूम जनता की है।
ये नेता किसी एक राजनैतिक दल या विचारधारा के नहीं होते ये भौंरे के समान हैं कभी इस फूल कभी उस फूल और ये जिस भी दल में होते हैं वहां मेहमान की तरह होते हैं।
आगे गीत में आता है कि कभी उड़ जाए कभी मंडराए भेद जिया के खोले न। ऐसे राजनेता भी एक ऐसी पार्टी की तलाश में होते हैं जो उनको सत्ता का सुख दे सके।
सत्तानशीं होने के बाद ये भोली जनता से ऐसे ऐसे बचते हैं जैसे कोई अनजाना और मिल कर भी नहीं मिलते।
अब चूंकी इनकी कोई मूल विचारधारा नही होती तो ये अपने विचार भी नही व्यक्त करते। न ये इस विंग के होते हैं न उस विंग के बस होते हैं तो सिर्फ अपने और अपने परिवार के विंग के।
किसी भी राजनेता के दल बदलने से कोई आपत्ति भी नही है वो बदल सकता है उसका अधिकार है बशर्ते वह उस जनता को स्पष्टीकरण दे जिसने उसे चुना है , मंजूरी ले यदि जनता सहमत है तो उसका दल बदल का अधिकार जायज़ हो सकता है।
शुक्रिया शकील बदायुनी जी का जो 1962 में ऐसा सजीव चित्रण किया और आशा भोसले जी का जिन्होंने अपनी मधुर आवाज में इसे कर्णप्रिय बनाया।
( “यश शर्मा” अनुराग दर्शन समाचार )




