विवेकानंद कड़ाके की ठंड में गृहस्थों के कल्पवास को देखकर अचंभित थे-स्वामी महेशाश्रम

प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। अखिल भारतीय दंडी संन्यासी परिषद के संरक्षक जगद्गुरु स्वामी महेशाश्रम बताते हैं कि स्वामी विवेकानंद की सनातन धर्म के प्रति उनकी अटूट आस्था थी। लेकिन वे उसे वैज्ञानिक स्वरूप में साबित होते देखना चाहते थे। जिससे दुनिया को उसकी अनुभूति कराकर सनातन धर्म का वैभव बढ़ा सकें।

यही कारण है कि विवेकानंद कड़ाके की ठंड में सुख-सुविधा विहीन रहकर गृहस्थों के कल्पवास को देखकर अचंभित थे। चिंतित थे कि यहां गृहस्थ ज्ञान-वैराग्य क्यों अर्जित करने आते हैं? क्या वास्तव में उन्हें संगम तीरे ईश्वर सानिध्य की अनुभूति होती है? संगम की रेती से कैसा लगाव है लोगों का?
स्वामी विवेकानंद की तमाम शंकाओं का समाधान दंडी संन्यासी शिवेश्वरानंद आश्रम ने किया था। स्वामी शिवेश्वरानंद ने प्रयागराज के कल्पवास, गंगा व संगम स्नान, रेती में नंगे पांव होने वाले भ्रमण, अनुष्ठान से जुड़ी समस्त शंकाओं का समाधान किया। वरिष्ठ पत्रकार व आध्यात्मिक चिंतक बताते हैं कि स्वामी विवेकानंद ने प्रयागराज में उन्हें ‘वैदिक दर्शन’ का ज्ञान प्राप्त हुआ। सनातन धर्म, वैदिक दर्शन व उपनिषद का अध्ययन किया। विवेकानंद ने स्वयं कहा था कि ‘उन्हें प्रयागराज में धर्म व दर्शन का जो बोध हुआ वह अन्यत्र कहीं प्राप्त होने वाला नहीं था।’


