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शक्ति अराधना एवं राम की महिमा

(ज्योति श्रीवास्तव) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। यह एक सुखद संयोग ही है की वर्ष के दोनों मुख्य नवरात्रों से राम का संबंध है हम राम की महिमा एवं नवरात्र के बखान करने से पहले हम हमारे धर्म संस्कृति के कलेवर को समझने का प्रयास करते हैं
हमारी संस्कृति हमारा धर्म पूरी तरह से वैज्ञानिकता की चाशनी में पगा हुआ है हमारे प्रत्येक पर्व प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान के पीछे एक तार्किक संदेश छिपा है हम वर्ष के दो महत्वपूर्ण नवरात्रों का उदाहरण ले सकते हैं शारदीय नवरात्र में उपवास उपासना पद्धति हमें हमारे जैविक सिस्टम को हाड़ कपा देने वाली ठंड के लिए तैयार करता है और ठीक इसी तरह चैत्र नवरात्रि में हम अपने आप को आने वाली प्रचंड गर्मी के लिए तैयार करते हैं अतः नवरात्र धर्म और विज्ञान दोनों से जुड़ा हुआ है अब हम आध्यात्मिक पृष्ठभूमि पर आते हैं चैत्र नवरात्रि में नवमी तिथि और राम का जन्म होता है इस तरह अवध नरेश दशरथ के संतान न होने के संताप को क्षीर सागर के अधिपति भगवान विष्णु स्वयं उनके यहां पुत्र के रूप में जन्म लेकर राजा दशरथ को सुख का सागर प्रदान करते हैं और आश्विन नवरात्र का परिप्रेक्ष्य देखे तो राम शक्ति पूजा करके मां जगदंबा की आशीष से आसुरी शक्तियों को परास्त करते हैं और धर्म तथा मानवता की स्थापना करते हैं राम की लंका पर विजय धरती पर प्रथम अंतरराष्ट्रीय विजय रही होगी राम सरस हैं सुकोमल है और संयमित भी राम महज एक अवतार नहीं हमारी संस्कृति के पुरोधा पुरुष हैं सागर और बूंद जैसा संबंध है राम और सनातन धर्म में अर्थात जो सनातन संस्कृति अपने आप में इतनी व्यापक है जो शायद शब्दों में समेटी नहीं जा सकती उस सनातन धर्म में राम सागर के समान है अर्थात राम की विशालता अमापनीय है राम का विराट स्वरूप शैशव काल में ही झलक उठता है जब कौवे जैसे अधम पक्षी को शिशु राम अपनी रोटी दे देते हैं और यह उसका मोक्ष सुख होता है राम बाल्यकाल काल में वशिष्ठ के आश्रम में सहज बालकों की तरह शिक्षा प्राप्त करते हैं अपने भाइयों के साथ ना कि राजपूत्र के तरह त्रेता युग में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की यह पहली झलक है शिक्षा प्राप्ति के बाद राम विश्वामित्र के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में बाधा डालने वाले असुरों को दंडित करने के लिए भी जाते हैं वहीं पर विश्वामित्र के साथ जाते हुए राम गौतम ऋषि के शापित पत्नी अहिल्या को श्राप मुक्त करते हैं यह राम का सामाजिक कल्याण की ओर पहला कदम था वही विश्वामित्र ऋषि के साथ राम सीता स्वयंवर में भी जाते हैं शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा कर माता जानकी के संताप का शमन करते हैं जनक नंदिनी सीता राम का वरण करती हैं शिव धनुष टूटने के पश्चात क्रोधित हुए परशुराम ऋषि से लक्ष्मण का विवाद होता है यहां राम की शांति प्रियता और शीलता झलकती है जब अवध नरेश का पुत्र और एक अवतारी पुरुष स्वयं को परशुराम ऋषि के दास के रूप में संबोधित करता है राम कथा में विवाह के बाद मां के कहने पर पिता की आज्ञा से राम सहर्ष वन को चले जाते हैं यह पित्र भक्ति की अविस्मरणीय मिसाल है बन जाते हुए राम निषाद राज से मिलते हैं उत्कृष्ट मित्रता एवं सामाजिक वैमनस्य को पाटने का यह प्रथम प्रयास है वन गमन में राम शबरी के आश्रम में जाते हैं एक राजपूत्र एक अछूत स्त्री के जूठे बेर खाते हैं यह जाति व्यवस्था के विरुद्ध पहला प्रहार था यह बात और है कि आध्यात्मिक दृष्टि से यह प्रसंग भक्त और भगवान के मध्य प्रेम का है रामकथा आगे बढ़ती है रावण द्वारा माता सीता का अपहरण हो जाता है राम भक्त हनुमान के सहयोग से सुग्रीव राम की मित्रता होती है मित्र के सहयोग के लिए राम क्षत्रिय मर्यादा को ताक पर रखते हुए सुग्रीव के भाई बाली का छिपकर वध करते हैं इस प्रसंग से यह बात स्थापित हुई थी कोई भी मर्यादा धर्म और मानवता से बड़ी नहीं होती राम और रावण का युद्ध से पूर्व सागर पर सेतु का निर्माण होता है लोक निर्माण कार्य का यह पहला उदाहरण है लंका पर आक्रमण से पूर्व भगवान राम अपने इष्ट देव भगवान शंकर के शिवलिंग की स्थापना करते हैं जो सेतबार रामेश्वरम के नाम से जाना जाता है शिव भक्त राम का युद्ध उस रावण से होता है जो स्वयं परम शिव भक्त था अवध नंदन राम रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहलाए राम का युद्ध अधर्म के विरुद्ध धर्म की स्थापना हेतु था इस युद्ध में धर्म और सत्य की विजय हुई तथा स्त्री मर्यादा भी संरक्षित हुई राम का जीवन एक आदर्श जीवन दर्शन को स्थापित करता है प्रत्येक सनातनी राम के चरणों में सदैव नतमस्तक रहेगा ।

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