विश्व परिवार दिवस एक नये संकल्प के साथ

( ज्योति श्रीवास्तव )प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। मानव और परिवार दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं मनुष्य ने कब और कैसे परिवार का निर्माण कर लिया यह विषय तो विकासवाद का है किंतु यह एक निर्विवाद सत्य है कि परिवार के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती गुफा और कंदरा में रहता हुआ मानव और आज अंतरिक्ष में चांद की सैर करता हुआ मानव ने विकास की एक लंबी यात्रा तय की है और इस पूरी यात्रा में मानव के साथ परिवार अवश्य ही रहा है बदलती परिस्थितियों में परिवार के रूप और मायने भले ही बदले हो लेकिन उसकी आवश्यकता आज भी मूलभूत ही है 1994 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने अंतर्राष्ट्रीय परिवार वर्ष के रूप में घोषित किया इसी के बाद प्रत्येक वर्ष 15 मई को विश्व परिवार दिवस मनाया जाने लगा विश्व परिवार दिवस को मनाने के पीछे यही उद्देश्य रहा है कि हम परिवार को बदलते समय में मानव की आवश्यकताओं के अनुरूप ढाल सकें परिवार एक मौलिक और प्रथम सामाजिक संगठन है यह एक ऐसा सामाजिक संगठन है जो स्वत:ही अपने अस्तित्व को बनाए रखा है समाजशास्त्री परिवार को एक ऐसी एजेंसी के रूप में भी परिभाषित करते हैं जिसके माध्यम से मनुष्य अपनी दैहिक आवश्यकता को मुख्यता यौन आवश्यकताओं को संतुलित ढंग से पूरी कर पाता है हमारे यहां मानव जीवन के चार आश्रम बताए गए हैं जिसमें ब्रह्मचर्य आश्रम के बाद विवाह के द्वारा मनुष्य गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है और इसी गृहस्थ आश्रम में मानव धर्म अर्थ काम और मोक्ष की प्राप्ति करता है परिवार के अभाव में मानव समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है मानव जाति ने सभ्यता और संस्कृति के विकास में कई परिवर्तनों को स्वीकार किया है किंतु परिवार नामक संस्था पर आंच नहीं आई है परिवार का बनना और टूटना भले ही दिखाई पड़ता हो उसके स्वरूप में भी अवश्य ही परिवर्तन आया है लेकिन आज भी परिवार अपने अस्तित्व को बनाए रखने में सक्षम है जैनेंद्र कुमार कहते हैं परिवार मर्यादाओं से बनता है और अनुशासन को बनाए रखता है पाश्चात्य विचारक भले ही परिवार को सेक्स से जोड़ते हुए उसके सीमित स्वरूप का ही वर्णन करते हो किंतु भारत में परिवार को भी एक विशाल सोच से देखा जाता है हमारे उपनिषद में वसुधैव कुटुंबकम की बात कही गई है अर्थात पूरी वसुधा ही हमारा परिवार है अतः हम धरती के प्राणी मात्र वनस्पतियों समस्त संसाधनों को परिवार के रूप में स्वीकारते हैं जिसे अब इकोसिस्टम का नाम दिया जाता है हम नदी को मां कहते हैं पृथ्वी को मां कहते हैं आकाश को पिता कहते हैं और इसी तरह कई ग्रह नक्षत्रों को अपने रिश्तेदारों के नाम से संबोधित करते हैं जैसे आज भी मां बच्चे को खिलाने के लिए चंदा मामा की बात करती है हमारे लिए तो संपूर्ण प्रकृति ही हमारा परिवार है अतः विश्व परिवार दिवस पर हम परिवार के व्यापक अर्थ को लेते हुए वर्तमान परिवेश में परिवार की महत्ता और सार्थकता पर बात करेंगे वर्तमान सदी में परिवार के स्वरूप में बहुत ही बदलाव आया है संयुक्त परिवार विलुप्त होते जा रहे हैं उनकी जगह एकल परिवार लेते जा रहे हैं संयुक्त परिवार की ढेरों अच्छाइयां है जो एकल परिवारों में पूरी नहीं की जा सकती आज की हमारी आर्थिक आवश्यकताओं को देखते हुए प्रायः युवा घर से दूर यहां तक की देश से भी दूर विदेशों में अर्थ उपार्जन के लिए जा रहे हैं बढ़ती हुई भौतिक आवश्यकताओं के लिए स्त्री पुरुष दोनों ही काम कर रहे हैं ऐसे में संयुक्त परिवारों की आवश्यकता और अधिक है बड़े शहरों में एक और भी विडंबना देखने को मिलती है छोटे-छोटे बच्चों के लिए क्रच जैसे व्यवसायिक संस्थान खुल गए हैं जहां कामकाजी माता-पिता अपने नौनिहालों को छोड़कर 8 घंटे 10 घंटे ऑफिस के कार्यों में या बिजनेस में व्यस्त रहते हैं जिन बच्चों को दादी बाबा नानी नाना बुआ और चाचा के साथ रहना चाहिए था वे क्रच में या फिर घर में आया के साथ रहते हैं अतः परिवार एक सामाजिक संस्था से ऊपर उठकर मानव के समस्त विकास के लिए आवश्यक है परिवार के माध्यम से ही बालक शिक्षा ग्रहण करने की दिशा में आगे बढ़ता है परिवार से ही हम अर्थ उपार्जन के लिए भी प्रेरित होते हैं परिवार हमें हमारी आस्था और धार्मिक परंपरा का संस्कृतियों का ज्ञान कराता है आज के दौर में जैसे बड़े-बड़े घरों की जगह छोटे-छोटे फ्लैट्स ने ले ली है वैसे ही संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों ने ले ली है जिसका हमें भारी खामियाजा चुकाना पड़ रहा है हमें प्रयास करना चाहिए की हम पुनः संयुक्त परिवारों की स्थापना कर सकें और उनकी स्थिति में सुधार कर सकें तुलसीदास जी ने कहा है काम क्रोध मद लोभ सब नरक के पंथ अतः जब हम अपने स्वार्थी मानवीय दुर्गुणों से दूर हो सकेंगे तभी सच्चे मायने में संयुक्त परिवारों की रक्षा कर सकते हैं और यकीन मानिए भारत वैसे ही नहीं विश्वगुरु कहलाता है यदि हम अपने पारंपरिक विरासत को बचाने में उसका विकास करने में सफल हुए तो ना सिर्फ हम अपने व्यक्तिगत जीवन में सुखी हो सकते हैं बल्कि हमारे राष्ट्र और समाज का और भी अधिक विकास हो सकेगा आइए विश्व परिवार दिवस पर हम यही संकल्प लेते हैं। और हमारे साथ साथ सभी मकानों से भी आवाज आ रही है हमें घर बना दो इन ईट पत्थरों और कंक्रीट की दीवारों में हमारा दम घुट रहा है हमें लौटा दो हमारा हंसता खेलता आंगन और रौनक लगाते बैठक।



