निर्मल मन से भगवान प्राप्त होते हैं – छल कपट से नहीं – व्यास राजेंद्र जी

प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार ) । श्री नव संवत्सर मानस समिति द्वारा माता कल्याणी देवी परिसर में आयोजित श्री राम कथा में व्यास मानस मर्मज्ञ पंडित राजेंद्र जी ने बताया कि लोग ईश्वर प्राप्ति के लिए किए जाने वाले प्रयासों हेतु संकोच करते हैं। सोचते हैं दुनिया क्या कहेगी। सच्चाई यह है कि मीराबाई को कृष्ण भगवान से प्रेम हो गया, उनकी भक्ति की पराकाष्ठा से उन्हें लोग पागल तक कहने लगे। मां कौशल्या प्रभु (पुत्र) राम जी खेलते समय पकड़ने जाती हैं तो ठुमुकी हुमुकी पावा – मोहि कपट छल श्रद्धा न भाव। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए निष्कपट भाव से शुद्ध मन से प्रयास करना चाहिए। कर्म व पुरुषार्थ करते समय भी भगवान को स्मरण करना चाहिए नहीं तो सफलता नहीं मिलती। श्री राम कथा में व्यास पंडित राजेंद्र जी ने बताया कि दशरथ के चारों पुत्रों का राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न नाम करण हुआ। संस्कार ऐसा की प्रात काल उठी के रघुनाथा – मानू पिता गुरु नावहिं माथा। यद्यपि बालक की प्रथम गुरु मां होती किंतु समयक ज्ञान शिक्षा के लिए गुरु आश्रम में गए। चारों भाई राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न कुछ बड़े हो गए तो निशाचरो का वध करने के लिए महर्षि विश्वामित्र राम व लक्ष्मण को लेने के लिए दशरथ जी के पास गए। रोते हुए उनसे कहा मैं यज्ञ नहीं कर पा रहा हूं असुर समूह सतावीह – मोहिं। इसलिए हे राजन – अनुज समेत देहु रघुनाथा। वशिष्ठ मुनि की सहमति से दशरथ जी ने भगवान राम व लक्ष्मण को दे दिया। विश्वामित्र जी उन्हें लेकर अपने आश्रम आए उन लोगों ने राक्षसों का वध कर दिया। यज्ञ निर्बाध रूप से होने लगे। राक्षस वध के बाद मुनि विश्वामित्र भगवान राम लक्ष्मण को लेकर जनकपुर के लिए चल पड़े। रास्ते में गौतम ऋषि का आश्रम मिला वहां शीला के रूप में पड़ी अहिल्या का उद्धार किया। फिर जनकपुर पहुंचे। वहां राजा जनक से राम व लक्ष्मण जी का परिचय कराया। सीता जी को महल खाली कराकर वही राम जी लक्ष्मण से एवं विश्वामित्र जी को टीका दिया। कार्यक्रम में मुन्नी चौरसिया, शिवेश श्रीवास्तव एवं मयंक अग्रवाल ने प्रसाद वितरण किया देवी मां की आरती, श्रृंगार, शतचंडी महायज्ञ तथा कन छेदन, मुंडन संस्कार आदि बड़ी संख्या में प्रतिदिन होते हैं।



