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रविंद्र नाथ टैगोर : एक विश्व मानव

( ज्योति श्रीवास्तव )
प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। कालजई रचनाकारों की फेहरिस्त में गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा है उनका साहित्य संगीत कला उतना ही प्रासंगिक आज भी है जितना उनके समय में था 7 मई 1861 में कोलकाता में देवेंद्र नाथ टैगोर और शारदा देवी के यहां एक नन्हे बालक का जन्म हुआ कौन जानता था यह बालक रविंद्र नाथ टैगोर के नाम से विश्व प्रसिद्ध होगा 1913 में वह पहले एशियाई हुए जिन्हें गीतांजलि के लिए साहित्य का पहला नोबेल पुरस्कार मिला रविंद्र नाथ टैगोर जिन दिनों साहित्य की रचना कर रहे थे उन दिनों विश्व दो खेमों में बट रहा था पूंजीवाद और साम्यवाद और अधिकतर साहित्यिक रचनाएं भी इन्हीं दो खेमों में बांट रही थी किंतु टैगोर ने अपनी स्वतंत्र शैली के हिसाब से स्वतंत्र मानववाद की स्थापना की उन दिनों उग्र राष्ट्रवाद भी पनप रहा था हिटलर और मुसोलिनी जैसी शक्तियां विश्व को अपने शिकंजे में कसने के लिए लालायित थे ऐसे में स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय वाद के लिए टैगोर भरसक प्रयास कर रहे थे जहां गांधी जी राष्ट्रवाद को पहले पायदान पर रखते थे वही टैगोर मानववाद को प्राथमिकता देते रहे आज विश्व जिस विभीषिका में जल रहा है ऐसे में टैगोर का मानव वादी दृष्टिकोण बड़े ही काम का है जो इस वायरस महामारी के खिलाफ लड़ाई में हमारे काम आ सकती है टैगोर के साहित्य में उत्कृष्ट आशावादी दृष्टिकोण भी झलकता है टैगोर लिखते हैं जब किसी बच्चे का जन्म होता है ईश्वर का यह संदेश छिपा होता है कि वह मानव जाति से अभी निराश नहीं हुआ है और संकट की परिस्थितियों में आशावाद की बहुत अधिक आवश्यकता होती है जैसा कि इन दिनों हो रही है जब टैगोर लिखते हैं तथ्य भले ही अलग-अलग हो किंतु सत्य एक है तब वे सर्वधर्म समभाव की बात करते हैं टैगोर निर्माण में यकीन रखते हैं और कहते हैं कि पुष्प की पंखुड़ियों को तोड़कर अलग करने वाला व्यक्ति कभी भी पुष्प के सौंदर्य को नहीं समझ सकता यहां सामाजिक एकता और सामाजिक समन्वय का रहस्य छिपा हुआ है उनका साहित्य व्यवहारिक होने की शिक्षा देता है जब वे कहते हैं कि उपदेश देना सरल है किंतु समाधान बताना कठिन इसी बात को और आगे ले जाते हुए वे कहते हैं कि सुंदर दिखना सरल है परंतु सरल होना सरल नहीं है टैगोर को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने डॉक्टर ऑफ लिटरेचर की उपाधि दी रविंद्र नाथ टैगोर के शब्द शब्द में शिक्षा है किंतु शिक्षा को व्यक्ति पर थोपने की बात भी नहीं करते वे बाल मन को उनके स्वतंत्रता के साथ शिक्षा देने की बात करते हैं बच्चों को जबरदस्ती शिक्षा देने के विरोध में वह अपना अनुभव साझा करते हैं जब उन्हें स्कूल भेजा गया वे लिखते हैं मुझे मेरी दुनिया से अलग कर दिया गया और विद्यालय में कुर्सी बेंच अपनी अंधी आंखों से मुझे घूर रहे थे रविंद्र नाथ टैगोर ने औपचारिक शिक्षा भले ही नाली हो किंतु वह बहुत बड़े शिक्षाविद हुए उन्होंने शांतिनिकेतन जो आज विश्व भारती के नाम से जाना जाता है की स्थापना की वे साहित्य रचना के माध्यम से स्वाधीनता आंदोलन की अलख जगाते रहे और 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में उन्होंने अपनी नाइटहुड की उपाधि लौटा दी आज हम टैगोर के जन्म दिवस पर उनके साहित्य से उनके जीवन दर्शन से पर्याप्त प्रेरणा पा सकते हैं जिससे जीवन की चुनौतियों का सामना किया जा सके यह कहना अतिशयोक्ति ना होगा की टैगोर का साहित्य उनका जीवन दर्शन सार्वभौमिक है देशकाल की सीमाओं से परे वे एक विश्वमानव है।

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