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वट सावित्री व्रत : नारी तुम तो संस्कृति संरक्षिका हो—ज्योति श्रीवास्तव

(ज्योति श्रीवास्तव) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। जेठ मास की अमावस्या को वट सावित्री अमावस्या भी कहा जाता है। यह एक ऐसा व्रत है जिसे हिंदू धर्म में महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए करती हैं हमारे यहां हमारी संस्कृति में वर्ष के 365 दिन किसी ना किसी व्रत पूजा पाठ धार्मिक अनुष्ठान आदि से जुड़ा है। यह भारतीय संस्कृति का अनूठापन है और और हमारी संस्कृति अत्यधिक समृद्धि भी है इतने अधिक व्रत उपवास तीज त्यौहार पर्व विश्व के किसी कोने में नहीं मिलेंगे जितने भारत में मनाए जाते हैं। वट सावित्री व्रत में एक पौराणिक कथा आती है की देवी सावित्री ने जेठ की अमावस्या के दिन है जब उनके पति की मृत्यु हो गई थी यमराज के हाथों से उन्होंने अपने पति के प्राण वापस ले लिए थे । और वट वृक्ष के नीचे ही उनके मृत पति पुनः जीवित हो गए थे और उन्होंने वट वृक्ष की पूजा की थी मान्यता है कि तभी से महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए वट सावित्री अमावस्या का व्रत रखती है। हिंदू वर्ष के 12 महीने में जेठ अपनी पिघला देने वाली तपिश के लिए जाना जाता है कहने का आशय है कि गर्मी और तपन जेठ माह में अपनी उच्चतम पराकाष्ठा पर होता है ऐसे में महिलाएं निर्जल व्रत रखकर धूप दीप नैवेद्य आदि चढ़ाकर बरगद के पेड़ में कच्चे सूत बांधकर इस व्रत को पूरा करती है। हमारे यहां स्त्रियों को प्रेम समर्पण और त्याग की प्रतिमूर्ति माना जाता है जयशंकर प्रसाद की एक पंक्ति है नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत नग पग तल में पीयूष स्रोत सी बहा करो जीवन के अवनि और अंबर तल में। स्त्रियां अपनी कोमल और पवित्र भावनाओं के कारण अमृतधारे की तरह होती हैं और हमारी संस्कृति को बढ़ाने में जिस तरह अपना योगदान देती हैं। हम यह भी कह सकते हैं नारी तुम तो संस्कृति संरक्षिका हो। फिर चाहे वह करवा चौथ हो हरितालिका तीज हरियाली तीज और भी अनेक को व्रत उपवास जो महिलाओं के वजह से ही चलन में है। और साथ में है वट सावित्री व्रत से वट वृक्ष की पूजा यह भी संदेश देता है की वृक्ष हमारे लिए कितने महत्वपूर्ण हैं और वट वृक्ष की तो बात ही अलग है यहां पर वट वृक्ष से एक और जानकारी साझा करने का मन हो रहा है उत्तर प्रदेश में प्रयागराज में संगम तट पर अकबर के किले के भीतर एक अति प्राचीन वट वृक्ष है जिसे सतयुग से जोड़कर देखा जाता है यह एक किवदंती हो सकती है। किंतु एक मशाल की तरह हमें रास्ता तो दिखा ही रहा है कि हमें बरगद पीपल नीम आम जैसे विशाल वृक्ष लगाने की जरूरत है नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब हम पीठ पर शुद्ध ऑक्सीजन गैस सिलेंडर लेकर चलेंगे जैसे आज हर घर में वॉटर प्यूरीफायर टंगा दिखता है। इसीलिए हमारे व्रत उपवास पूजा पाठ की पद्धति और तीज त्यौहार धार्मिक होने के साथ-साथ सामाजिक सांस्कृतिक और वैज्ञानिक उत्थान का भी संदेश देते हैं। अतः जब हमारे घर की स्त्रियां बरगद वृक्ष में कच्चा सूत बांधकर पूजा करेंगी हमें यह भी संकल्प लेना चाहिए कि हम बरगद पीपल आदि वृक्षों को अधिक से अधिक लगाएं जिससे हमारी पृथ्वी हरी-भरी और समृद्ध रहे लोगों का जीवन सुखमय हो और उत्कृष्ट संस्कृतियों का विकास होता रहे।

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