मंदिर में चुनरी या धागा बांधने से होती है मन्नत पूरी

जहां माता का हाथ गिरकर अदृश्य हो गया इस मंदिर का नाम अलोप शंकरी मंदिर पड़ा
देवी मां की कोई प्रतिमा या मूर्ति नहीं है बल्कि एक कुंड है
(अनुराग शुक्ला)प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। प्रयागराज में आलोपी बाग वह जगह है जहां शक्तिपीठ मां अलोपशंकरी देवी माता का मंदिर बेहद खास है । क्योंकि यह देश के अलग-अलग स्थानों में मौजूद 51 शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस स्थान पर माता सती के दाएं हाथ का पंजा गिरा था। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां माता की निराकार पूजा होती है। कहने का मतलब है कि यहां देवी मां की कोई प्रतिमा या मूर्ति नहीं है। बल्कि एक कुंड है जहां माता का हाथ गिरकर अदृश्य हो गया था।जिसके चलते इस मंदिर का नाम भी अलोप शंकरी मंदिर पड़ा। आपको बता दे कि मंदिर के मुख्य भाग में एक चबूतरा है। चबूतरे के बीचो-बीच एक कुंड है। कुंड के ऊपर एक झूला और झूले को चुनरी से ढका गया है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यहां देवी का वास जल में है और झूला उनका स्वरूप है। मंदिर में मौजूद कुंड में नारियल का पानी चढ़ाया जाता है और यही भक्तों को प्रसाद स्वरूप दिया जाता है। क्योंकि इस मंदिर में माता की कोई प्रतिमा या मूर्ति नहीं है। इसलिए नवरात्रि के दौरान यहां श्रृंगार तो नहीं होता लेकिन पाठ जरूर होते हैं। ऐसी मान्यता है कि मंदिर में चुनरी या धागा बांधने से मन्नत पूरी हो जाती है। साथ ही यहां आए भक्तगण पूजा- अर्चना करने के बाद मंदिर की परिक्रमा भी करते हैं।
*दाएं हाथ का पंजा गिरा था यहाँ 14 वें नंबर का शक्तिपीठ मंदिर*
यह है मंदिर की पौराणिक कथा
जब ऋषि नारद मुनि ने माता सती को यह बताया कि उनके पिता प्रजापति दक्ष एक बढ़ा यज्ञ करवा रहे हैं। तो माता सती ने भगवान शिव से वहां जाने की इच्छा जताई लेकिन भगवान शिव ने यह कहकर मना कर दिया गया कि हमें तो बुलाया ही नहीं गया। भगवान शिव के मना करने पर भी माता सती अपने पिता के यहां चली गई। वहां पर अपने पिता द्वारा अपने पति के अपमान को सहन ना कर पाने के कारण उन्होंने यज्ञ कुंड में कूद कर अपनी प्राणों की आहुति दे दी।जब इस बात का ज्ञान भगवान शिव को हुआ तो वह माता सती के जलते हुए शरीर को गोद में लेकर संपूर्ण भूमंडल में क्रोधवश भ्रमण करने लगे। इस दौरान माता के 51अंग देश-विदेश के भिन्न-भिन्न स्थानों पर गिरे थे।इनमें से एक स्थान प्रयागराज का अलोपी बाग भी है। जहां माता के दाएं हाथ का पंजा गिरा था। यह 14वें नंबर का शक्तिपीठ है।




