पंडित बालकृष्ण भट्ट ने समाज-साहित्य सेवा में मनसा-वाचा-कर्मणा अपने क्रांतिकारी चिन्तन का परिचय दिया

(अनुराग शुक्ला ) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। अधिकांशतः लोग समय के साथ चलते हुए उससे प्रभावित होकर उसी के अनुरूप अपने को ढाल लेते हैं, जबकि कुछ गिनती के ऐसे लोग भी होते हैं, जो अपने चिन्तन और कार्य-व्यवहार से समय-जमाने को बदलने को मजबूर कर देते हैं । पंडित बालकृष्ण भट्ट जी ने यही कार्य अपनी सोच-समझ और क्रांतिकारी विचारों से करके देश-समाज-साहित्य-पत्रकारिता में परिवर्तन की लौ जला दी । उनका यह कार्य इस लिए और भी महत्त्वपूर्ण था कि इसे उन्होंने अंग्रेजी शासन के समय सर्वथा विपरीत परिस्थितियों में लगभग 150 वर्ष पहले कर दिखाया था ।”उक्त विचार हिन्दी के भीष्म पितामह पंडित बालकृष्ण भट्ट जी की पुण्य-तिथि के अवसर पर भारती भवन पुस्तकालय में आयोजित श्रद्धा-अर्पण कार्यक्रम में वक्ताओं ने व्यक्त किए ।
अध्येता-चिन्तक आनन्द मालवीय ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज साहित्य-समाज को नई दृष्टि देनेवाले ऐतिहासिक महापुरुष का भारती भवन के ऐतिहासिक परिसर में भावपूर्ण स्मरण हो रहा है । कार्यक्रम की विशिष्टता यह भी है कि इसमें अध्ययनशील नई पीढ़ी की भी भागीदारी हो रही है । हमारे साथ नई पीढ़ी को भट्ट जी जैसे पुरोधा का भावपूर्ण स्मरण कर निश्चय ही यह अनुभूति भी हो रही होगी कि मानो वे आज साहित्य-पत्रकारिता के तीर्थ में पहुँच गए हैं । भट्ट जी पारिवारिक आर्थिक दृष्टि से निर्बल जरूर थे। किन्तु सोच योगदान से अति समृद्ध थे । उस समय उनके समर्पित भाव से ‘हिन्दी-प्रदीप’ का सीमित स्वरूप में प्रकाशन होता था, किन्तु उसकी धमक समग्र देश में सुनाई पड़ती थी । केसर विद्यापीठ इण्टर कालेज के प्रवक्ता नरेन्द्र सिंह ने उन्हें भारतेन्दु युग का चमकता सितारा निरूपित किया, जिन्होंने अपनी जिजीविषा से साहित्य-पत्रकारिता को क्रांतिकारी तेवरों से समृद्ध किया । सुप्रसिद्ध समाजसेवी छुन्नन गुरु के पौत्र डा0 अमित मोहिले ने पुरा-वर्तमान की तुलना करते हुए बताया कि बचपन में हम सब भट्ट जी, महामना, पंडित प्रतापनारायण मिश्र, आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी जैसे महापुरुषों के विचारों को पाठ्यक्रम के जरिए पढ़ते हृदयंगम करते थे, लेकिन आज ऐसा नहीं है, जिसके कारण नई पीढ़ी अपने इन पूर्वजों से वैचारिक दृष्टि से दूर हो गई है ।
वरिष्ठ छायाकार अरविन्द मालवीय के अनुसार भारती भवन और मालवीयनगर क्षेत्र महामना, भट्ट जी, राजर्षि, व्यास जी, भल्ला जी जैसे महापुरुषों की जन्म स्थली रही है। संचालक व्रतशील शर्मा के अनुसार भारती भवन के ऐतिहासिक पुस्तकालय में 21 जुलाई, 1914 को महामना के सभापतित्व में भट्ट जी की स्मृति में श्रद्धांजलि-सभा का आयोजन हुआ था । भट्ट जी ने महर्षि दधीचि की भाँति अपना सर्वस्व अर्पित कर देश-समाज, साहित्य-पत्रकारिता की जैसी अनूठी सेवा की, वह सदैव याद की जाएगी । कार्यक्रम का प्रारम्भ उप प्रधानाचार्य अजित कुमार खरे की अगुवाई में भट्ट जी के चित्र पर माल्यार्पण के साथ हुआ ।स्वतंत्र पाण्डेय,पुस्तकालयाध्यक भारती भवन ने आभार ज्ञापित किया ।पूर्व प्राचार्य डा0 चन्द्रविजय चतुर्वेदी ने दूरभाष के द्वारा अपने सन्देश में भट्ट जी के ऐतिहासिक योगदान का स्मरण करते हुए दुःख व्यक्त किया कि स्कूल स्वतंत्र भारत में भट्ट जी को उनके स्तर के अनुरूप मान सम्मान नहीं मिल सका है, जो दुःखद है । कम-से-कम प्रयागराज में उनकी स्मृति में पत्रकारिता संस्थान की स्थापना समय की माँग है । कार्यक्रम में अश्रुत उपाध्याय, सुनील सिंह, शिवाकान्त तिवारी, सुधीरकुमार शुक्ल, उस्मान सिद्दीकी, वैष्णवी सिंह, जीशान अहमद, संकल्प मालवीय, राजेन्द्रप्रसाद, श्यामजी शुक्ल, हिमांशु त्रिपाठी, अजीत कुमार, धीरेन्द्र सिंह, विकास यादव, बृजेश सिंह, अंशुमान, सुमित मिश्र, सुनील सिंह, अभय कुमार सहित अन्य साहित्य-अनुरागी उपस्थित रहे ।



