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जब भगवान की कृपा होती है तभी संतो का दर्शन होता है-शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती

(अनुराग शुक्ला ) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। भगवान आदि शंकराचार्य मंदिर श्री ब्रह्म निवास अलोपीबाग में आराधना महोत्सव में बोलते हुए पूज्य व्यास श्रवणनंद जी ने श्रीमद् भागवत महापुराण कथा सुनाते हुए बताया कि प्रत्येक मनुष्य को अपने मन के भीतर का अवगुण दोष ही अपने गुरु में दिखाई पड़ता है। इसलिए जब गुरु के प्रति दोष की भावना आने लगे तब प्राणी को अपने मन के बुरे विचारों को मन से निकालना चाहिए। भागवत कथा से ही वैराग्य प्राप्त होता है। जब पत्नी रत्नावली ने फटकार लगाई तभी गोस्वामी तुलसीदास जी ‘संत’ हो गए।व्यास जी ने बताया कि संसार भगवान का ही रूप है। राजा में भी ईश्वर का गुण होता है। जीवन की आचार संहिता बताते हुए कहा कि बड़ो, गुरु से सम्मान नहीं आशीर्वाद पाना चाहिए। गुरु से सम्मान पाने की इच्छा हो जाए तो खुद समझ लेना चाहिए की कलियुग हमारे ऊपर प्रभावी हो रहा है। कलियुग अधर्म का मित्र है। जुआ, शराब, व्यभिचार, हत्या और स्वर्ण ही कलियुग के प्रमुख स्थान है। जिसे अपनी गलती का एहसास नहीं होता वह सुधर नहीं सकता।श्रीमज्योतिषपीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती जी ने अपने आशीर्वाद में बताया कि जब भगवान की कृपा होती है तभी संतो से संपर्क व दर्शन होता है। भगवान कृष्ण ने 54 दिन तक भीष्म पितामह की प्रतीक्षा किया। अंत भीष्म पितामह जी भगवान कृष्ण के ही चरण शरण में चले गए। अंतः करण के अंधकार को संत दूर कर देते हैं। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से जगतगुरु घनश्यामाचार्य जी ,पंडित राम नरेश त्रिपाठी ‘पिंडी वासा’ दंडी सन्यासी विनोदानंद, पूर्व प्रधानाचार्य शिवार्चन उपाध्याय, ब्रह्मचारी आत्मानंद, ब्रह्मचारी विशुद्धानंद, आचार्य विपिन, स्वामी अदैतानंद, पंडित मनीष,आचार्य भगवान दास जी आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

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