देश

प्रथम तो नरजन्म ही दुर्लभ, फिर पुरुषत्व और उससे भी ब्राह्मणत्व का मिलना कठिन-नरेन्द्रानन्द सरस्वती

इलाहाबाद। श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर यति सम्राट अनन्त विभूषित पूज्य जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज ने श्री काशी सुमेरु मठ डुमराँव बाग कालोनी में चातुर्मास कर रहे दण्डी सन्यासियों एवम् उपस्थित बटुकों तथा भक्तों को अपना आशीर्वचन प्रदान करते हुए कहा कि

“जन्तूनां नरजन्म दुर्लभमत: पुंस्त्वं ततोविप्रता
तस्माद्वैदिक धर्ममार्गपरता विद्वत्त्वमस्तात्परम् |
आत्मानात्मविवेचनम् स्वनुभवो ब्रह्मात्मनासंस्थिति-
र्मुक्तिर्नो शतजन्मकोटि सु कृतै: पुष्यविना लभ्यते ||
जिसका अर्थ है कि, जीवों को प्रथम तो नरजन्म ही दुर्लभ है, उससे भी पुरुषत्व और उससे भी ब्राह्मणत्व का मिलना कठिन है ।

ब्राह्मणत्व होने से भी वैदिक धर्म का अनुगामी होना और उससे भी विद्वत्ता का होना कठिन है । यह सब होने पर भी आत्मा और अनात्मा का विवेक, सम्यक् अनुभव, ब्रहमात्म-भाव से स्थिति और मुक्ति —ये तो करोड़ो जन्मों में किये हुये कर्मों के परिपाक के बिना प्राप्त हो ही नहीं सकते ।
पूज्य श्री ने ब्याख्या करते हुए कहा कि, मनुष्य जन्म यकायक नहीं मिला है, किसी ईश्वर ने इसे वरदान स्वरुप अथवा भेंट या दान स्वरूप नहीं दिया है । बल्कि यह चेतना की विकास प्रक्रिया से गुजरकर कीट, पतंग, एवं पशु आदि योनियों से गुजर कर लाखों वर्षों बाद मिला है । किंतु मनुष्य जन्म ले लेना ही पर्याप्त नहीं है, इस से भी आगे इसे अपनी चेतना का विकास करना है, मनुष्य होकर उसे पुरुषत्व प्राप्त करना है, ब्राह्मणत्व प्राप्त करना है । ब्राह्मण वही है, जो ब्रह्म ज्ञानी है, अन्य कोई ब्राह्मण नहीं है ।

ब्राह्मण जाति में जन्म लेना भी सौभाग्य ही है, जो पूर्व जन्म के अच्छे संस्कारों से ही होता है, किंतु ब्राह्मण होकर मूढ़ रहना उसके लिए अभिशाप है, उसे वैदिक धर्म का अनुगामी बनकर निरंतर अपनी चेतना के विकास का मार्ग खोजना है, तथा सत्यासत्य का निर्णय लेकर ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना है, तभी उसकी पूर्णता है । ब्रह्म ज्ञान के लिए उसे आत्मा और अनात्मा, सत्य और मिथ्या, शाश्वत और क्षणिक के भेद का विवेक जागृत करना है, उसका सम्यक् अनुभव करके ब्रह्म एवं आत्मभाव में स्थित होना है, यही अवस्था मुक्ति की अवस्था है, जो इस मनुष्य जन्म का अंतिम लक्ष्य है,यही उसकी परमगति है ।

जिसे प्राप्त किए बिना उसका मनुष्य जीवन व्यर्थ है । यह स्थिति एकाएक किसी को वरदान स्वरुप प्राप्त नहीं हो जाती, यह कई जन्मों में किए गए अच्छे कर्मों के परिपाक के बिना संभव नहीं है ।

यह इतनी सरल नहीं है कि एक ही जन्म के सुकृत्य एवं साधना से प्राप्त हो जाए, कई जन्मों की साधनाएं परिपक्व होने पर ही यह स्थिति आती है। आज का बोया गया बीज कई वर्षों के बाद फल देता है, उसी प्रकार निरंतर कई जन्मों की साधना से ही मनुष्य की मुक्ति होती है | आज जो मनुष्य आध्यात्मिक उच्चता को प्राप्त कर गए हैं, वह उनके पूर्व के कई जन्मों का परिणाम है, इसलिए इसे प्राप्त करना प्रत्येक मनुष्य का धर्म है, यही उसका चरम विकास है ।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button