व्रत-त्योहार

VIDEO बुद्ध बैसाख पूर्णिमा: जीवन में स्थायी सुख-शांति प्राप्ति के लिए होता है यह व्रत

इलाहाबाद। हिंदी पंचांग के अनुसार वैशाख माह की पूर्ण चंद्र तिथि को ‘वैशाख पूर्णिमा’ के नाम से जाना जाता है। हिंदू तथा बौद्ध पंथियों के लिए कई प्रकार से इस दिन का विशेष महत्व है। मान्यता है कि गृह त्याग के पश्चात सात वर्षों तक वन में भटकने के बाद इसी दिन भगवान बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इसी दिन भगवान बुद्ध ने महानिर्वाण भी प्राप्त किया था इसलिए इस दिन को ‘बुध पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार बुद्ध को भगवान विष्णु का 9वां अवतार भी माना जाता है जो वैशाख की पूर्णिमा तिथि को ही पैदा हुए थे, इसलिए इस दिन को ‘बुद्ध जयंती’ के रूप में भी जाना जाता है। एक मान्यता के अनुसार जब भगवान कृष्ण से मिलने उनके मित्र सुदामा द्वारका गए तो उनकी दरिद्रता से व्यथित कृष्ण ने उन्हें वैशाख पूर्णिमा के दिन विनायक पूर्णिमा व्रत करने के लिए कहा था और उसी के फलस्वरूप सुदामा की दरिद्रता दूर हुई। इसलिएए इस तिथि को ‘सत्य विनायक पूर्णिमा’ भी कहा जाता है।

बुद्ध पूर्णिमा का महत्व

वैदिक ज्योतिष के अनुसार यूं तो पूर्णिमा की हर तिथि का विशेष महत्व होता है किंतु ‘बुद्ध जयंती’ तथा ‘बुद्ध का निर्वाण प्राप्ति दिवस’ होने के कारण ‘वैशाख पूर्णिमा’ का अत्यधिक महत्व माना गया है। यही वजह है कि जीवन में स्थायी सुख-शांति प्राप्ति के लिए इस दिन व्रत तथा विशेष नियमों का पालन किए जाने का विधान बताया है।

मान्यता है कि जो भी जातक इस दिन सच्चे मन से व्रत करता है, उसके जीवन से हर प्रकार गरीबी तथा दुखों का अंत होता है। वह धर्म की राह पर चलता है तथा शांतिपूर्ण एवं समृद्ध जीवन जीता है। असमय आने वाली परेशानियां जहां दूर होती हैं वहीं वह असमय या अकाल मृत्यु से भी वह बचा रहता है। अकाल मृत्यु को मोक्ष की प्राप्ति में बाधा माना गया है।

इस दिन व्रत रखकर किसी जरूरतमंद को जल से भरा घड़ा तथा भोजन का दान करना मोक्षदायी तथा संपन्नता प्राप्त कराने वाला माना गया है। वैशाख पूर्णिमा पर स्वर्ण दान करना भी अति फलदायी माना गया है। बुद्ध अनुयायियों के बीच इस दिन सफेद वस्त्र धारण करने की भी विशेष मान्यता है।

व्रत विधि

प्रात: काल में स्नान आदि से निवृत्त होकर घर पर या किसी मंदिर में जाकर भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजन करें। इसके पश्चात अगर व्रत का संकल्प लें सकें तो पूरे दिन फलाहार के साथ उपवास रखें। रात्रि काल चंद्रमा को जल अर्पण करते हुए धूप, दीप, गुड़ तथा पीले पुष्पों से पूजा करें। इसके पश्चात जल से भरा एक कलश या घड़ा किसी पंडित को दान कर दें।

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