मनुष्य को बड़े भाग्य से मानव शरीर प्राप्त होता है,अपने अन्दर ईश्वरीय गुणों का विकास करना चाहिए – शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द

( अनुराग शुक्ला )प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर यति सम्राट अनन्त श्री विभूषित पूज्य जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज ने आज अपने माघ मेला शिविर में उपस्थित सनातन धर्मावलम्बी श्रद्धालुओं को अपना आशीर्वचन प्रदान करते हुए कहा कि मनुष्यों में अनेक प्रकृति के लोग होते हैं | गीता में उनको २ भागों में विभक्त किया गया है। एक दैवी प्रकृति और दूसरी आसुरी प्रकृति |
“द्वौ भूतसर्गौ लोके$स्मिन् दैव आसुर एव च”
भय का अभाव, अन्त:करण की स्वच्छता, तत्वज्ञान के लिए ध्यानयोग में निरन्तर स्थिति, दान, इन्द्रियसंयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, चुगली न खाना, समस्त प्राणियों पर दया, अलोलुपता, मृदुता, लज्जा, अचञ्चलता, तेज, छमा, धृति, शौच, कहीं भी वैरभाव न होना तथा अभिमान का अभाव—ये सब दैवी प्रकृति के लोगों में विकसित होने वाले सद्गुण हैं |
पूज्य शंकराचार्य भगवान ने कहा कि आसुरी प्रकृित के लोग इनसे सर्वथा विपरीत होते हैं | कौन सा काम करना चाहिए। और कौन सा नहीं हम किस कार्य में लगें और किस कार्य से अलग रहें। इन सब बातों को वे बिल्कुल नहीं समझते | शौच, सदाचार और सत्य तो उनमें रहता ही नहीं | वह जगत को बिना ईश्वर के ही उत्पन्न हुआ मानते हैं | इसके मूल में कोई सत्य है, इसका कोई नित्य चेतन आधार है। इन सब बातों को वे नहीं स्वीकार करते | उनकी समझ में केवल काम ही इस जगत का हेतु है और यह स्त्री-पुरुषों के संयोग से ही सतत उत्पन्न होता है | इस मिथ्या ज्ञान का आश्रय लेने से उनका सत्य स्वरूप आत्मा तिरोहित-सा हो जाता है । वह अल्प बुद्धि होने के कारण सब का अहित करने वाले क्रूरकर्मी बन जाते हैं और जगत के विनाश में ही कारण बनते हैं | वह अपने मन में ऐसी-ऐसी कामनाएं पालते हैं, जो कभी पूर्ण न हो सकें | वह दंभ, मान और मद से उन्मुक्त होते हैं और मोहवश मिथ्या सिद्धांतों को ग्रहण करके भ्रष्टाचार से संयुक्त हो स्वेच्छाचारपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं | मरण-पर्यंत अनंत चिंताओं में डूबे रहते हैं | सदा कामोपभोग में संलग्न होकर इतना ही सुख है ऐसा मानते रहते हैं | सैकड़ों आशा के बंधनों में बंधकर, काम-क्रोधपरायण हो, काम-भोग के लिए ही अन्यायपूर्वक धन संचय करना चाहते हैं | इसीलिये वे अन्ततोगत्वा बार-बार आसुरी योनि और नरक में पड़ते हैं | मनुष्य को बड़े भाग्य से मानव शरीर प्राप्त होता है, अस्तु अपने अन्दर दैवी गुणों का विकास करना चाहिए |



