वास्तव में आंतरिक उत्कर्ष ही संतत्व का लक्षण : नरेन्द्रानंद सरस्वती

समाज पर संकट के समय सन्तों ने अपना सर्वस्व बलिदान किया
प्रयागराज( अनुराग दर्शन समाचार )। ब्रह्मलीन स्वामी गोविन्द रामानुजदास जी महाराज शरीर से आज हमारे बीच नहीं हैं। परन्तु उनके विचार, आदेश, निर्देश एवं उपदेश आज भी समाज के प्रेरणास्रोत हैं। समाज पर जब भी संकट उत्पन्न हुआ, सन्तों ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। संतों का सम्बंध बाहरी आडंबरों से नहीं है। वास्तव में आंतरिक उत्कर्ष ही संतत्व का लक्षण है।
उक्त विचार माघ मेला के गंगोली शिवाला मार्ग स्थित श्री लक्ष्मी नारायण देवस्थान धर्मार्थ ट्रष्ट के शिविर में रविवार को श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज ने ब्रह्मलीन स्वामी गोविन्द रामानुज दास जी महाराज (स्वामी गोकर्णाचार्य) के 28वें पुण्य तिथि पर आयोजित सन्त सम्मेलन में श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि संसार में साधु-संतों का बड़ा काम है। सन्तों ने मानव समाज को ईश्वरीय ज्ञान, संस्कार, जीवन जीने की कला व विकास की तमाम क्रियाओं से जोड़ा। ऐसे बड़े कामों के लिए लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए संत का बड़ा अच्छा और वैसा ही सही स्वरूप होना चाहिए, जैसे ईश्वर के किसी प्रतिनिधि का होना चाहिए। यह उत्कर्ष उसकी क्रियाओं में प्रकट होता है, यही संत की सबसे बड़ी पहचान है। संत का कर्म कभी स्वार्थ के अनुरूप नहीं होता, हमेशा परमार्थ के अनुरूप होता है। दधीचि ने राष्ट्र और मानवता की रक्षा हेतु ही अपने प्राणों का उत्सर्ग कर अपनी हड्डियों का दान किया था।
सम्मेलन की अध्यक्षता टीकरमाफी के परमाध्यक्ष स्वामी हरि चैतन्य ब्रह्मचारी एवं संचालन जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी घनश्यामाचार्य महाराज ने किया। सम्मेलन में प्रमुख रूप से ब्रह्मचारी ब्रह्मस्वरूप, जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी राजारामाचार्य, जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी कृष्णाचार्य, महामण्डलेश्वर सन्तोष दास सतुआ बाबा, स्वामी हर्ष चैतन्य ब्रह्मचारी, स्वामी जयराम दास, महामण्डलेश्वर जगदीशाचार्य रामायणी, महंत राम प्रपन्नाचार्य, महंत कुलशेखराचार्य, दण्डी स्वामी शंकरआश्रम, स्वामी चक्रपाणि सहित अन्य जगद्गुरु, सन्त एवं महन्त उपस्थित रहे।



