ब्रह्मलीन हो चुके महंतों को भी बांटी जा रही जमीन और सुविधाएं

मेला प्रशासन की मिलीभगत से चल रही सरकारी पैसों की लूट
कुछ तथाकथित महंत चला रहे दुकान
प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार ) । वैसे तो हर जगह सरकारी पैसों की बंदरबांट होती है, लेकिन धार्मिक कार्यक्रम भी पैसों की लूट का साधन बनें तो हैरानी होती है। संगम की रेती पर लगने वाले माघ मेले में भी अधिकारियों और बाबाओं की मिलीभगत से हर वर्ष मोटी रकम बर्बाद की जा रही है। मेले में ऐसे महंतों के नाम पर भी जमीन और सुविधाएं बांटी जा जाती हैं जो वर्षों पूर्व ब्रह्मलीन हो चुके हैं और उनकी जगह रिक्त है। ब्रह्मलीन हो चुके महंतों से जुड़े तथाकथित महंत मेला प्रशासन की मिलीभगत से उनके नाम पर मिलने वाली जमीन और सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं। ब्रह्मलीन हो चुके महंतों के नाम पर मिलने वाली जमीन और सुविधाएं कुछ महंतों के लिए कमाई का जरिया बन चुकी हैं। वह लोगों को शिविरों में रखकर किराया वसूलते हैं। मतलब जमीन और सुविधाएं सरकार देती है और उससे कमाई स्वनामधन्य बाबा करते हैं। हर वर्ष माघ मास में स्वयम्भू शिविराध्यक्षों द्वारा अपात्रों को जो महंती की डिग्री बाटी जाती है उसके पीछे का भी यही खेल है। जमीन और सुविधाओं पर कब्जा जमाए रखने के लिए ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वनामधन्य महंत या शिविराध्यक्ष ब्रह्मलीन हो चुके महंतों की जगह लेने की कोशिश में जुटे हैं। कुछ तथाकथित महंतों द्वारा मेला प्रशासन की मिलीभगत से चलाए जा रहे इस गोरखधंधे पर संतों और महंतों को भी आपत्ति है। उनकी मांग है कि मेला प्रशासन को निष्पक्ष रुप से जांच करनी चाहिए और जो महंतगण ब्रह्मलीन हो चुके हैं उनकी संस्थाओं को शून्य मानकर भूमि और सुविधाओं का आवंटन बंद करना चाहिए। इससे न केवल सरकारी पैसों की बचत होगी बल्कि भगवावस्त्र को कमाई का जरिया बनाने वालों पर भी रोक लगेगी। यही संत समाज के हित में भी है।




