भगवान शंकराचार्य से जुड़ी है ज्ञानवापी मंदिर की जीवन गाथा—-

प्रयागराज ( अनुराग दर्शन समाचार )। जय शिवसेना भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं ज्योतिष्पीठ शंकराचार्य के प्रवक्ता ओंकार नाथ त्रिपाठी ने काशी विश्वनाथ मंदिर एवं ज्ञानवापी मंदिर के संबंध में बताया की सनातन धर्म एवं हिंदू धर्म पर लिखे गए कुछ प्राप्य व कुछ अप्राप्य शास्त्रों, पुराणों का विस्तृत गहन अध्ययन व परिचर्चा से ज्ञानवापी मंदिर व कुंड आदि के सृजन व सृजन कर्ता तथा संरक्षको व प्रबंधकों के संबंध काल चक्र के अनुसार सम्यक सारभूत ज्ञान हो सकेगा। वर्तमान में भी भगवान विश्वेश्वर नाथ मंदिर ज्ञानवापी व्यास पीठ, ज्ञान कूप, ज्ञानवापी हाता के प्रबंधक के रूप में पंडित केदारनाथ व्यास जी ने पंचकोषात्मक ज्योतिर्लिंग, काशी महात्म्य और अन्य विभिन्न धार्मिक विषयों पर पुस्तके लिखीं। इनके लिखे हुए तमाम ग्रंथ व पांडुलिपिया भी कहा जाता है कि ज्ञानवापी मंदिर, शिवलिंग व तहखानों के मलवों में दबी हो सकती है। ध्वंस मंदिर भागों के मलवों,तहखानों में बंद तालों को खुलवाने से बहुत से ढके, छिपे साक्ष्य साक्षात प्रकट दिखाई देंगे।
भगवान शंकराचार्य व पंडित मंडन मिश्र से जुड़ी कथा ज्ञानवापी व काशी विश्वनाथ मंदिर के महात्म्य व प्राचीनता को स्वयमेव प्रकट कर रहे हैं। वास्तव में स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले ही इस संबंध में मालिकाना हक/अधिकार का मामला चल रहा था जिसमें व्यास परिवार को सफलता मिली। ज्ञानवापी परिसर ही व्यास परिवार का हुआ करता था। औरंगजेब 1969 में ज्ञानवापी परिसर स्थित मंदिर ध्वस्त करके वही मस्जिद बनवा दिया। इस संबंध में व्यास परिवार के लोग स्वतंत्रता पारित से पहले ही स्वामी मालिक हैं जिसका मुकदमा भी वे लोग लड़ रहे हैं। कानूनी दस्तावेजों के अनुसार परिसर और ज्ञानवापी मंदिर जिसके ऊपर अब विवादित कथित मस्जिद बनी है तथा एक तहखाने का स्वामी बैजनाथ व्यास के नाम बताया जाता है। ज्ञानवापी हाता में स्थित व्यास परिवार का आवास कोई सामान्य भवन नहीं था। भगवान आदि शंकराचार्य व पंडित मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ की कथा ज्ञानवापी मंदिर की जीवन गाथा का महत्वपूर्ण अंश है। इस परिसर में इनकी मूर्ति व भगवान राधा कृष्ण का मंदिर भी था जो अब विस्तृत छानबीन होने से पुनः प्राप्त हो सकते हैं। आजादी से पहले का मंदिर मामला है इसलिए उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम 1991 से यह बाधित नहीं है।


