बदलते दौर में महिलाओं के साथ ही पुरुष भी करते हैं करवा चौथ का व्रत

प्रयागराज। 26 अक्टूबर सफल और खुशहाल दाम्पत्य जीवन की कामना के साथ कल उत्तर प्रदेश समेत देश के विभिन्न हिस्सों में सुहागिन महिलाएं करवा चौथ का व्रत रखेंगी।

आधुनिकता की चकाचौंध ने भले ही सभी तीज-त्यौहार को प्रभावित किया हो लेकिन सदियों पुराना करवा चौथ का व्रत सुहागिन स्त्रियाँ पति की दीर्घायु के लिए श्रद्धा एवं विश्वास के साथ करती हैं। बदलते दौर में पति भी अपने सफल दाम्पत्य जीवन के लिए इस व्रत का पालन करने लगे है। मोबाइल फोन और इंटरनेट के दौर में ‘करवा चौथ’ के प्रति महिलाओं में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आयी बल्कि इसमें और आकर्षण बढ़ा है।

कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला करवाचाैथ पर्व पति के प्रति समर्पण का प्रतीक हुआ करता था, लेकिन आज यह पति-पत्नी के बीच के सामंजस्य और रिश्ते की ऊष्मा से दमक और महक रहा है। आधुनिक होता दौर भी इस परंपरा को डिगा नहीं सका है बल्कि इसमें अब ज्यादा संवेदनशीलता, समर्पण और प्रेम की अभिव्यक्ति दिखाई देती है।

डॉक्टर कुमुद श्रेया दुबे ने बताया कि पर्व की महत्ता न/न केवल महिलाओं के लिए पुरूषों के लिए भी है। पति और पत्नि गृहस्थी रूपी रथ के दो पहिया हैं। किसी एक के भी बिखरने से पूरी गृहस्थी टूट जाती है। इस व्रत में चन्द्रमा को छलनी में देखने का विधान इस बात की ओर इंगित करता है, पति-पत्नी एक दसरे के दोष को छानकार सिर्फ गुणों को देखें। करवाचौथ का त्योहार पति-पत्नी के मजबूत रिश्ते, प्यार और विश्वास का प्रतीक है।

पौराणिकता के साथ-साथ इसमें आधुनिकता का प्रवेश हो चुका है और अब यह त्योहार भावनाओं पर केंद्रित हो गया है। हमारे समाज की यही खासियत है कि हम परंपराओं में नवीनता का समावेश लगातार करते रहते हैं। यह पर्व पति-पत्नी तक ही सीमित नहीं हैं। दोनों चूंकि गृहस्थी रुपी गाड़ी के दो पहिए है। निष्ठा की धुरी से जुड़े हैं इसलिए संबंधों में प्रगाढता के लिए दोनों ही व्रत करते हैं।
उन्होंने कहा कि करवाचौथ’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, ‘करवा’ यानी ‘मिट्टी का बरतन’ और ‘चौथ’ यानि ‘चतुर्थी’। इस त्योहार पर मिट्टी के बरतन यानी करवे का विशेष महत्व माना गया है। इस व्रत में भगवान शिव शंकर, माता पार्वती, कार्तिकेय, गणेश और चंद्र देवता की पूजा-अर्चना करने का विधान है। करवाचौथ की कथा सुनने से विवाहित महिलाओं का सुहाग बना रहता है, उनके घर में सुख, शान्ति,समृद्धि और सन्तान सुख मिलता है।
बदलाव आधुनिकता का जरूर है लेकिन संस्कृति और परंपराओं के निभाने की पूरी ललक विवाहिताओं में साफ दिखाई दे रही है। आजकल के मॉडर्न जमाने में भी करवा चौथ त्योहार मनाने को लेकर पीढ़ी अंतराल के बावजूद कोई खास बदलाव नहीं आया है। रिश्तों और पुरानी परंपराओं को सहेजने में नई पीढ़ी भी कोर कसर नहीं छोड़ रही है। करवाचौथ को अधिक बल टीवी धारावाहिकों से मिला है। करवा चौथ भावना के अलावा रचनात्मकता, कुछ-कुछ प्रदर्शन और आधुनिकता का भी पर्याय बन चुका है।
करवा चौथ पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान समेत अन्य कई प्रदेशों में मनाया जाता है। शास्त्रों-पुराणों में उल्लेख मिलता है। ‘वामन पुराण’ में करवा चौथ व्रत का वर्णन मिलता है। करवा चौथ से जुड़ी अनेक कथायें भी प्रचलित हैं। महाभारत में भी करवाचौथ के महात्म्य पर एक कथा का उल्लेख मिलता है।
उन्होने ने बताया कि भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को करवाचौथ की यह कथा सुनाते हुए कहा था कि पूर्ण श्रद्धा और विधि-पूर्वक इस व्रत को करने से समस्त दुख दूर हो जाते हैं और जीवन में सुख-सौभाग्य तथा धन-धान्य की प्राप्ति होने लगती है। श्री कृष्ण भगवान की आज्ञा मानकर द्रौपदी ने भी करवा-चौथ का व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से ही अर्जुन सहित पांचों पांडवों ने महाभारत के युद्ध में कौरवों की सेना को पराजित कर विजय हासिल की।
करवाचौथ का व्रत और पूजन का इसबार बहुत विशेष महत्व है। इस बार 70 साल बाद करवाचौथ पर रोहिणी नक्षत्र और मंगल का योग एक साथ आ रहा है। ज्योतिष के मुताबिक यह योग करवाचौथ को और अधिक मंगलकारी बना रहा है। इससे पूजन का फल हजारों गुना अधिक होगा। करवाचौथ पर रोहिणी नक्षत्र का संयोग होना अपने आप में एक अद्भुत योग है।
रविवार होने से इसका महत्व और बढ़ गया है। चंद्रमा में रोहिणी का योग होने से मार्कण्डेय और सत्यभामा योग बन रहा है। यह योग चंदमा की 27 पत्नियों में सबसे प्रिय पत्नी रोहिणी के साथ होने से बन रहा है। पति के लिए व्रत रखने वाली सुहागिनों के लिए यह बेहद फलदायी होगा। ऐसा योग भगवान श्रीकृष्ण और सत्यभामा के मिलन के समय भी बना था।



