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महंत बजरंगमुनि उदासीन ने बताया-सरदार पटेल क्यों कहलाते थे लौह पुरुष

प्रयागराज। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर मजबूत और एकीकृत भारत के निर्माण में सरदार वल्लभभाई पटेल का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। श्री पटैल को आखिर क्यों कहा जाता था लौह पुरुष इस बारे में महंत बजरंगमुनि उदासीन ने बताया कि, गीता में भगवान कृष्ण ने कर्म कौशल को योग रूप में समझाया है. अर्थात अपनी पूरी कुशलता, क्षमता के साथ दायित्व का निर्वाह करना चाहिए.।

 

सरदार पटेल ने आजीवन इसी आदर्श पर अमल किया. जब वह वकील के दायित्व का निर्वाह कर रहे थे, तब उसमें भी मिसाल कायम की. जब वह जज के सामने जिरह कर रहे थे, तभी उन्हें एक टेलीग्राम मिला, जिसे उन्होंने देखा और जेब में रख लिया. उन्होंने पहले अपने वकील धर्म का पालन किया, उसके बाद घर जाने का फैसला लिया. तार में उनकी पत्नी के निधन की सूचना थी।

वस्तुत: यह उनके लौहपुरुष होने का भी उदाहरण था. ऐसा नहीं कि इसका परिचय आजादी के बाद उनके कार्यों से मिला, बल्कि यह उनके व्यक्तित्व की बड़ी विशेषता थी. इसका प्रभाव उनके प्रत्येक कार्य में दिखाई देता था।


बचपन में फोड़े को गर्म सलाख से ठीक करने का प्रसंग भी ऐसा ही था. तब बालक वल्लभभाई अविचलित बने रहे थे. एक बार उन्हें फोड़ा हो गया जिसका खूब इलाज करवाया गया लेकिन वह ठीक नहीं हुआ. इस पर एक वैध ने सलाह दी कि इस फोड़े को गर्म सलाख से फोड़ा जाए तो ठीक हो जाएगा. बच्चे को सलाख से दागने की हिम्मत किसी की भी नहीं हुई ऐसे में सरदार पटेल ने खुद ही लोहे की सलाख को गर्म किया और उसे फोड़े पर लगा दिया, जिससे वह फूट गया. उनके इस साहस को देख परिवार भी अचंभित रह गया.

यह प्रसंग उनके जीवन को समझने में सहायक है. आगे चलकर उनकी इसी दृढ़ता और साहस ने उन्हें महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और कुशल प्रशासक के रूप में प्रतिष्ठित किया. देश को आजाद करने में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया।

संविधान निर्माण में भी उनका बड़ा योगदान था. इस तथ्य को डॉ. अंबेडकर भी स्वीकार करते थे. सरदार पटेल मूलाधिकारों पर बनी समिति के अध्यक्ष थे. इसमें भी उनके व्यापक ज्ञान की झलक मिलती है. उन्होंने अधिकारों को दो भागों में रखने का सुझाव दिया था. एक मूलाधिकार और दूसरा नीति-निर्देशक तत्व.

मूलाधिकार में मुख्यत: राजनीतिक, सामाजिक, नागरिक अधिकारों की व्यवस्था की गई. जबकि नीति निर्देशक तत्व में खासतौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर ध्यान दिया गया. इसमें कृषि, पशुपालन, पर्यावरण, जैसे विषय शामिल है. इन्हें आगे आने वाली सरकारों के मार्गदर्शक के रूप में शामिल किया गया. बाद में न्यायिक फैसलों में भी इसकी उपयोगिता स्वीकार की गई. यहां इस प्रसंग का उल्लेख अपरिहार्य था.

सरदार पटेल भारत की मूल परिस्थिति को गहराई से समझते थे. वह जानते थे कि जब तक अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान महत्वपूर्ण बना रहेगा, तब तक संतुलित विकास होता रहेगा. इसके अलावा गांव से शहरों की ओर पलायन नहीं होगा. गांव में ही रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे. आजादी के बाद भारत को एक रखना बड़ी समस्या थी।

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