गंगा तट से

सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है-शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती

देवघर (अनुराग दर्शन समाचार )। झारखण्ड के देवघर जनपदान्तर्गत चितरा में आयोजित अतिरूद्र महायज्ञ में पधारे श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर यति सम्राट् अनन्त श्री विभूषित पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज का पूर्ण वैदिक विधि-विधान से पूजन किया गया | इस अवसर पर उपस्थित सनातन धर्मावलम्बी श्रद्धालुओं को अपना आशीर्वचन एवम् मार्गदर्शन प्रदान करते हुए पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि महारुद्र पाठ के एकादशा वृत्तियों से [ रुद्राध्याय के ११ ग़ूणा ११=१२१ एक सौ इक्कीस संख्या में जप करने से] समाहत-पाठ विधिको “अतिरुद्र” कहते हैं, जिससे ब्रह्मह्त्यादि निष्कृति रहित पापों का भी प्रक्षालन हो जाता है! इस पाठ की कोई तुलना ही नहीं है | रुद्रार्चन और रुद्राभिषेक से हमारी कुंडली से पातक कर्म एवं महापातक भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है | भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है, और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है। उन्होंने बताया की यज्ञ मण्डप की परिक्रमा से समस्त रोग व बीमारी दूर हो जाती है । जन्म-जन्मान्तर के पाप कट जाते है। यज्ञ कुण्ड से हवन का धुआँ स्वास प्रणाली से होकर शरीर के अन्दर प्रवेश कर बीमारी पैदा करने वाले कीटाणुओं का नाश करते हैं। यज्ञ कलियुग का कल्पबृक्ष है | यज्ञ वह विधा है, जिससे मनुष्य अपने सभी मनोरथों की सिद्धि प्राप्त कर सकता है | भगवान शिव आयोजकों को भरपूर शक्ति और सामर्थ्य प्रदान करें, यज्ञ सभी के लिए मंगलकारी हो | इस अवसर पर स्वामी बृजभूषणानन्द सरस्वती जी महाराज, स्वामी नरेशानन्द जी,पं० आकर्षित मिश्र, पं० अमर शर्मा, पं० अभिषेक पाण्डेय भी उपस्थित थे |

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