प्रयागराज। यहां दिल्ली और सूबाई राजधानियों में अक्सर अलग-अलग विचारधाराओं की सरकारें बनती हैं। यह जरूरी नहीं कि उनके विचार मेल खाते हों, परंतु राष्ट्रभक्ति की भावना भी क्या अलग-अलग हो सकती है? जिस संविधान की शपथ लेकर हमारे हुक्मरां सिंहासनों पर विराजते हैं, वह तो एक ही है। और किसी मामले में न सही, कम से कम नक्सलवाद व आतंकवाद के मसले पर वे एक राय कायम कर सकते हैं? अफसोस, इसका उल्टा हो रहा है।।
महंत बजरंगमुनि ने कहाँ कि लोकतंत्र की हत्या का सिर्फ षडयंत्र देखते हैं नेता,
जब तक देश में नेता रहेगे और नेतागीरी सत्ता के लिए होती रहेगी तो अंजाम यही होगा। सोचिए कि नेताओ पर और उनके परिवार पर हमले क्यों नही होते है। चाहे वह महाराष्ट्र हो या छत्तीसगढ़ या जम्मू- कश्मीर। हमले सिर्फ सेना के जवानो और आम पब्लिक पर होते है। हमारे यहाँ की खूफिया एजेंसिया श्रीलंका में हमले की चेतावनी देती है लेकिन अपने यहा होने वाले हमले की जानकारी नही रहती है।
आतंकवादी व नक्सलवादी जब जी चाहे भयानक हमले करते हैं. लेकिन आप लोग विभिन्न स्वार्थी राजनीतिक पार्टियों को वोट देते रहे,और उन्हें घटिया राजनीति करने का अवसर मिलता रहे।।
”सरकारी तंत्र और उनकी व्यवस्था चुनावी समर में व्यस्त है. वीर जवानों की शहादत के जिम्मेदार सिर्फ नक्सली ही नहीं बल्कि हमारी घटिया राजनीति भी है.”
साजिशों का मुहतोड़ जवाब देने का समय है लेकिन कई नेता देशहित के कामों में भी निजी स्वार्थ देखते हैं।
नेता सैनिकों के शहीद होने पर ही सैनिक के परिवार से मिलते हैं, उसके बाद उन्हें कोई नहीं पूछता। जिस दिन नेताओं के बच्चे शहीद होंगे, तब उन्हें असलियत का एहसास होगा।
”सियासत तुम्हारे जिगर में अगर हौसला होता, लहू जवानों का सड़कों पर यू नहीं पड़ा होता।।



