FEATUREDLatestLetest

दल नहीं, दिल और जज्बे का चुनाव: आप प्रत्याशी, महामंडलेश्वर भवानी के प्रचार का अंदाज है निराला

प्रयागराज, 06 मई। बड़े-बड़े राजनीतिक दलों के सूरमा पूरी चमक-दमक और लाव लश्कर के साथ तूफानी जनसंपर्क में लगे हैं। चुनाव की तारीख जैसे-जैसे करीब आ रही है उनकी भागदौड़ और जोड़ तोड़ और तेज होती जा रही है सभी अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए हर जतन कर रहे हैं। चाहे सपा बसपा गठबंधन से सपा उम्मीदवार हो या भाजपा कांग्रेस का हो, हर कोई क्षेत्रीय छत्रपों खासकर जातिगत बड़े चेहरों को अपने साथ लाने के लिए काम कर रहा है। बड़े-बड़े चौराहों और बाजारों में उनकी शानो शौकत के साथ सभाएं हो रही है। इन्हीं के बीच एक ऐसा भी उम्मीदवार है जिसके चुनाव प्रचार का एक अलग ही निराला अंदाज है उसके प्रचार को देख कर लगता है कि कोई दल नहीं बल्कि एक दिल और जज्बा चुनाव लड़ रहा है। न जीत की फिक्र ना हर की चिंता। उसका समाज के उन लोगों तक पहुंचना हो रहा है जिनके पास आमतौर पर नेता नहीं पहुंच पाते हैं। सभा क्या बैठक भी ऐसी जिसमें मतदाता महिला और पुरुष से ज्यादा संख्या में छोटे-छोटे बच्चे होते हैं वह भी बेहद गरीब परिवारों के। लेकिन इनसे भी प्रत्याशी का मिलना जुलना ऐसे होता है जैसे सचमुच उनके मतदाताओं की सभा हो रही है। हम बात कर रहे हैं आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी किन्नर अखाड़ा की महामंडलेश्वर भवानी की।


आम आदमी पार्टी की इलाहाबाद सीट से प्रत्याशी किन्नर महामंडलेश्वर भवानी देश की राजधानी दिल्ली की रहने वाली हैं। दिल्ली से आकर इलाहाबाद में चुनाव लड़ने का उनका फैसला ही बेहद चौंकाने वाला था। अब उनके चुनाव प्रचार का अंदाज चौका रहा है। अपने कुछ साथियों को कार से लेकर प्रचार के लिए निकलने वाली भवानी शहर के चौराहों के साथ ही गांवों में भी सभा और बैठक करती है। वह पढ़े लिखे और संपन्न लोगों से मिलने के साथ ही शहर की झुग्गी बस्तियों और गांव की दलित और गरीब बस्तियों में भी जाती है। बिना किसी स्थानीय बड़े नेता के सहयोग और पार्टी संगठन के उनका गरीबों तक पहुंचना है ही अपने आप में बड़ी बात है

एन केन प्रकारेण गरीबों की बस्तियों तक पहुंचने वाली भवानी देखने के लिए महिला पुरुष और बच्चे जीत जाते हैं उनके बैठने के लिए एक आधी तखत व चद्दर का प्रबंध किया जाता है। पीले गंदे की एक-दो मालाओं का भी इंतजाम पहले से रहता है। पहले गांव के लोग भवानी को माला पहनाते हैं और फिर भवानी पूनम आलू को वहां मौजूद छोटे बच्चों को पहना देती हैं। माल्यार्पण करने वाले लोग भी वह होते हैं

जिन्होंने शायद कभी इसकी कल्पना भी नहीं की रही होगी। हिलते हाथ और सकुचाता चेहरा इस बात की गवाही देते हैं । आम आदमी प्रत्याशी भोले भाले लोगों से कुछ बातें करती हैं। न भूमिका न भाषण। राजनीति से कोसों दूर गरीबी की जिंदगी जी रहे यह लोग भी भवानी को अपना मूक समर्थन देते हैं। न नारा न जयकारा, न लाउडस्पीकर की जरूरत पड़ती है और न ही जल जलपान चाय नाश्ते का कोई कार्यक्रम रहता है। लेकिन मिलन ऐसा होता है की देखने लायक रहता है। ऐसी मिठास बड़े दलों और नेताओं की बड़ी-बड़ी बैठकों और सभाओं में भी नहीं दिखती। चुनाव परिणाम चाहे जो भी हो लेकिन बेफिक्र भवानी का अंदाज़ दिल को छू लेने वाला है। उनकी बैठकों और उनमें मौजूद लोगों की संख्या व उम्र देखकर कोई सहज भाव से ही हस पड़ेगा की यह कैसा चुनाव प्रचार है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button