राम जन्म की कथा से भाव विभोर हुए श्रोता

प्रयागराज। पृथ्वी पर जब-जब असुरों का आतंक बढ़ा है तब-तब ईश्वर ने किसी न किसी रूप में अवतार लेकर असुरों का संहार किया है। जब धरा पर धर्म के स्थान पर अधर्म बढ़ने लगता है तब धर्म की स्थापना के लिए ईश्वर को आना पड़ता है। भगवान राम ने भी पृथ्वी लोक पर आकर धर्म की स्थापना की।

यह उद्गार श्री गंगा सेना शिविर में चल रही नौ दिवसीय श्री रामकथा के तीसरे दिन अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत श्री नरेंद्र गिरि महराज के कृपापात्र शिष्य योगाचार्य स्वामी श्री आनंद गिरि महराज ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आज का व्यक्ति ईश्वर की सत्ता को मानने से भले ही इंकार कर दे लेकिन एक न एक दिन उसे ईश्वर की महत्ता को स्वीकार करना ही पड़ता है।

संसार में जितने भी असुर उत्पन्न हुए सभी ने ईश्वर के अस्तित्व को नकार दिया और स्वयं भगवान बनने का ढोंग करने लगे, लेकिन जब ईश्वर ने अपनी सत्ता की एक झलक दिखाई तो सभी का अस्तित्व धरा से ही समाप्त हो गया। अधर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो लेकिन धर्म के मार्ग पर चलने वाले के आगे अधिक समय तक नहीं टिक सकता। स्वामी जी ने कहा कि बेटों की तरह बेटियाँ भी पिता की संपत्ति में बराबर की हक़दार हैं। बेटियों को कभी लालची वर के हाथ मे नही सौंपना चाहिए। और जब भी ससुराल से बहन बेटियां घर आयें उनको खाली हाथ कभी नही भेजना चाहिये।

बेटियों का सम्मान न करने वालों के घर कभी लक्ष्मी वास नही करती। आगे उन्होंने कहा कि ब्राह्माण पूजनीय होता है। ब्राह्माण का कभी उपहास नहीं करना चाहिए। जिसने ब्राह्मण का उपहास किया है उसका सर्वनाश ही हुआ है। स्वामी जी ने ब्राह्माण द्वारा भानुप्रताप को दिए गए श्राप की कथा का विस्तार से वर्णन किया। आचार्य ने श्रीराम जन्म की कथा सुनाते हुए कहा कि जब अयोध्या में भगवान राम का जन्म होने वाला था तब समस्त अयोध्या नगरी में शुभ शकुन होने लगे। भगवान राम का जन्म होने पर अयोध्या नगरी में खुशी का माहौल हो गया। चारों ओर मंगल गान होने लगे। राम जन्म की कथा सुन पांडाल में मौजूद श्रद्धालु अपने स्थान पर खड़े होकर नृत्य करने लगी। कथा का शारदा पांडेय, विजय खेतान, शोभना शर्मा, शरद मिश्रा, राकेश सुहाने आदि श्रद्धालुओं ने श्रवण कर पुण्य लाभ कमाया।




