माघ मेला विशेषसंत समागम

भगवान के चरणों का ध्यान करो, तुम्हारा समस्त दुख दूर हो जाएगा- शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती

प्रयागराज। माघ मेला के ओल्ड जी टी मार्ग स्थित अपने शिविर के पण्डाल में उपस्थित सनातन धर्मावलंबी श्रद्धालुओं को अपना आशीर्वचन प्रदान करते हुए श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर यति सम्राट अनन्त श्री विभूषित पूज्य जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज ने भक्ति एवम् ज्ञान-वैराग्य के विषय में विस्तृत ब्याख्या करते हुए मार्गदर्शन किया |


उन्होंने कहा कि एक बार देवर्षि नारद ने भक्ति देवी से उन्हें चिन्तित देखकर कहा कहा कि
“वृथा खेदयसे बाले, अहो तिन्तातुरा कथम् |
श्रीकृष्णचरणाम्भोजं स्मर दु:खं गमिष्यति ||
खेद न करो बाले | चिन्ता ब्याकुल होने की कोई आवश्यकता नहीं है | भगवान के चरणों का ध्यान करो, तुम्हारा समस्त दुख दूर हो जाएगा | भगवान ने ही कौरवों से द्रौपदी उद्धार और गोपकन्याओं की रक्षा की, वह कहीं चले नहीं गए हैं | भक्तिदेवी तुम तो भगवान को अतिशय प्रिय भी हो, तुम्हारे दुख का निवारण प्रभु अवश्य करेंगे | अन्य युगों में भक्ति वैराग्य साधक रहे होंगे, परन्तु कलियुग में भगवान का साक्षात्कार कराने वाली तो केवल तुम्हीं हो | इसी विचार से भगवान ने भक्तों के हितार्थ तुम्हें यहाँ भेजा है | मुक्ति तुम्हारी दासी है |

तुम्हें चिन्ता करने की जरूरत नहीं है | लोगों तुम्हारे पुत्र ज्ञान वैराग्य की बहुत उपेक्षा की है, उपेक्षा के कारण वे बुद्ध हो गये हैं, और सुसुप्तावस्था में हैं,मैं उन्हें जागृत करने का उपाय सोच रहा हूँ | नारद जी ने कहा कि यदि मैं घर घर तुम्हारा प्रचार न कर दूँगा तो मैं भगवान का दास नहीं | भक्ति से बढ़कर कलियुग में भगवान को पाने का दूसरा मार्ग है ही नहीं | भक्ति ही एकमात्र साधन है, जिससे भगवान बड़ी सरलता से सन्मुख हो दर्शन देते हैं—–

“कलौ भक्ति: कलौ भक्तिर्भक्त्या कृष्ण: पुर: स्थित: ||
पूज्य श्री ने कहा कि भक्ति के सामने ब्रत, तीर्थ, योग, यज्ञ, तप, दान आदि का कोई महत्व नहीं है |

पूज्य श्री ने कहा कि नारद जी द्वारा अपना माहात्म्य सुनकर प्रफुल्लित हो भक्तिदेवी ने देवर्षि नारद जी से बोली–हे मुनिवर आप धन्य हैं, मैं कभी भी आपका त्याग न कर आपके हृदय में विराजमान रहूँगी | आप अब किसी भी उपाय से मेरे पुत्रों (ज्ञान व वैराग्य) को जगाने का उपक्रम करें |
नारद जी ने ज्ञान व वैराग्य को झकझोर कर जगाने का प्रयत्न किया, किन्तु वे थोड़ा उठे परन्तु जम्हाई लेकर फिर सो गये | तब नारद जी ने भगवान का आश्रय लिया | भगवान ने कहा कि नारद तुम्हारा उद्योग सफल होगा, तुम इसके लिए सत्कर्म करो | नारद जी उन तीनों को वहीं छोड़कर तीर्थों में घूमते वह मार्ग में मिले महात्माओं से सत्कर्म के विषय में पूँछते रहे, जिससे उनका मनोरथ सिद्ध हो, किन्तु महात्माओं ने उन्हें वह सत्कर्म बताने में अपनी असमर्थता ब्यक्त की | जिससे नारद जी भी बहुत चिन्तित हुए |

पूज्य श्री ने बताया कि नारद जी भ्रमण करते हुए बदरिकाश्रम पहुँच गए | वहाँ उन्होंने सामने से आते सनकादिक महर्षियों को देखकर उन्हें प्रणाम कर कहा-कि मैं आकाशवाणी द्वारा कहे गए उस सत्कर्म के ज्ञानार्थ यहाँ तप करने आया हूँ, कृपा कर बतायें कि वह सत्कर्म क्या है, जिसका संकेत आकाशवाणी ने किया है ? सनकादिक ने कहा कि वह साधन तो अत्यन्त सरल व सुखसाध्य है | वैसे तो ॠषियों ने इसके अनेक उपाय बताये हैं, परन्तु वे सब परिश्रमसाध्य व स्वल्प फल देने वाले हैं |तुम्हारे जैसे उद्देश्य की प्राप्ति का साधन तो गोप्य है, उसका ज्ञाता बड़े ही भाग्य से मिलता है—–
“सत्कर्मसूचको नूनं, ज्ञान यज्ञ: स्मृतो बुधै: |
श्रीमद्भागवतालाप:, स तु गीत: शुकादिभि: ||

सत्कर्म का अर्थ विद्वानों ने ज्ञानयज्ञ बताया है, और वह ज्ञानयज्ञ श्रीमद्भागवत की कथा है | इसकी ध्वनि से ही कलि के दोष व उन तीनों के कष्ट मिट जायेंगे, और भक्ति ज्ञान और वैराग्य के साथ घर-घर जाकर प्रत्येक मनुष्य के हृदय में क्रीड़ा करेगी |

कलियुग में भक्ति की बहुत बड़ी महिमा हमारे धर्म ग्रंथो में गाई गई है, भक्ति का आश्रय लेकर मनुष्य इस संसार सागर के बन्धनों से मुक्त हो सकता है |

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