महंती बनी कमाई का जरिया-जमीन और सुविधा के लिए हर वर्ष बनते हैं कई महन्त

प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार ) । भगवा वस्त्र धारण किये कालनेमि रूपी स्वयंभू संतों-महंतों ने अपने दुष्कृत्यों से भगवा रंग और संत परंपरा पर सवालिया निशान लगाते रहे हैं। ऐसा ही कारनामा कुछ भगवाधारियों द्वारा माघ मेले में भी किया जा रहा है। सरकारी जमीन और सुविधाओं पर कब्जा जमाए रखने के लिए और खुद की कमाई के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। इन्हीं हथकंडों मैं एक हथकंडा महंती देने का है। बीते एक माह में कुछ स्वयंभू महंतों ने अपने कई चहेते चेलों को महंती की डिग्री बांटी। ऐसे महंतों के इस कार्य में तथाकथित कुछ मीडिया कर्मियों का भी भरपूर सहयोग है। कई महंतों ने परंपरा के मुताबिक तय मानकों के अनुरुप कुछ संतों को महंत बनाया। लेकिन कुछ शिविर अध्यक्षों ने अपने निहित स्वार्थों के लिए पदवी बांटी। यह, वह महंत है जो हर वर्ष महंती की डिग्री कुछ चेलों को देते हैं। चेला पात्र है या अपात्र इससे कोई लेना-देना नहीं। ऐसे स्वयंभू महंतों के बारे में बात करने पर नाम ना छापने की शर्त पर एक दंडी स्वामी ने बताया कि कुछ शिविराध्यक्षों द्वारा पैसे लेकर महंत बनाए जा रहे हैं। पात्र, अपात्र का भी ध्यान नहीं रखा जा रहा है। इससे संतों की गरिमा धूमिल हो रही है। ऐसा सिर्फ मेले में मिलने वाली जमीन और सुविधाओं पर कब्जा जमाए रखने के लिए किया जा रहा है। दंडी स्वामी ने इस बात का भी खुलासा किया कि महंती की डिग्री बांटने वाले महंतों की कुछ मीडिया कर्मियों से भी सांठगांठ होती है, जो उन्हें महिमामंडित करते हैं। उनके गलत कार्य को बढ़ा चढ़ाकर छापते हैं। बताया तो यह भी गया कि जिन्हें महंत बनाया जा रहा है वह भी दुखी हैं क्योंकि जिस मकसद से वह हजारों हजार रुपए खर्च करते हैं वह भी पूरा नहीं हो रहा। महंती की डिग्री बांटने वाले शिविराध्यक्षों से उनके अपने समाज लोग भी खुश नहीं है क्योंकि सरकार से मिलने वाली सारी व्यवस्थाएं शिविराध्यक्ष खुद लेते हैं, औरों का ध्यान बिल्कुल नहीं दिया जाता।




