मुकदमे के निस्तारण में देरी तो त्वरित परीक्षण के अधिकार का हननः हाईकोर्ट

13 साल से जेल में बंद हत्यारोपी को दी अंतरिम जमानत
प्रयागराज (अनुरागदर्शन समाचार )। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मुकदमों के निस्तारण में देरी होना त्वरित परीक्षण के अधिकारों का हनन है। कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए 13 साल से जेल में बंद हत्यारोपी की अंतरिम जमानत अर्जी मंजूर कर ली और उसे निजी मुचलके और दो प्रतिभूतियों पर रिहा करने का आदेश दिया।
यह आदेश जस्टिस अजय भनोट ने महेश चंद्र शुक्ल की जमानत अर्जी पर दिया है। मामले में याची ने चौथी जमानत याचिका दाखिल की थी। उस पर आईपीसी धारा 302, 307, 323, 504, 506 और आपराधिक धारा सात के तहत प्रयागराज के सोरांव तहसील में 2009 में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। याची की ओर से कहा गया कि मामले में उसे झूठा फंसाया गया है और कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। याची घटना के बाद से ही जेल में बंद है। मुकदमे में अत्यधिक देरी से आरोपी को अनिश्चितकालीन कारावास हो जाएगा। रिकॉर्डों में भी यह पाया गया कि याची की ओर से मुकदमे में किसी तरह की देरी नहीं की गई है।
कोर्ट ने कहा कि आवेदक को त्वरित न्याय का मौलिक अधिकार है। मामले में आवेदक को कैद करने से त्वरित परीक्षण के अधिकार का उल्लंघन होगा। कोर्ट ने निचली अदालत को मुकदमे के शीघ्र निस्तारण का आदेश देते हुए याची को अंतरिम जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।


