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बीजेपी के खिलाफ NOTA का चला जादू, UP में भी हो सकती है मुश्किल!

प्रयागराज। मध्य प्रदेश में डेढ़ फीसदी वोट नोटा को पड़े जो अपने आप में अहम था. साथ ही कई ऐसी सीटें रहीं जहां जीत का अंतर 100 से ज्यादा या उससे भी कम रहा।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद सियासी दलों के साथ-साथ पॉलिटिकल पंडितों में भी विश्लेषण का दौर जारी है. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से लगातार जीत का परचम लहरा रही पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी के विजय रथ को कांग्रेस ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जीत दर्ज कर रोका है. हालांकि छत्तीसगढ़ को छोड़ दिया जाए तो मध्य प्रदेश और राजस्थान में उसे वैसी जीत नहीं मिली जैसी उसे उम्मीद थी. राजस्थान में कांग्रेस ने बहुमत का आंकड़ा छुआ तो वहीं मध्य प्रदेश में वह बहुमत से दो सीट पीछे रह गई।

राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो बीजेपी की हार के पीछे किसान और बेरोजगारी के अलावा भी एक महत्वपूर्ण फैक्टर रहा नोटा (नॉन ऑफ द ऐबभ). खासकर मध्यप्रदेश में जिस तरह की कांटे की टक्कर रही, उसमें नोटा और सपाक्स पार्टी का चुनावी मैदान में उतरना भी अहम था. सपाक्स सामान्य पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक समुदाय के शासकीय सेवकों का संगठन है जो पदोन्नति में आरक्षण का विरोध करता है. कहा जा रहा है कि इसका असर लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में भी देखने को मिल सकता है।

मायावती के बाद अखिलेश यादव ने भी मध्यप्रदेश में कांग्रेस को दिया समर्थन

मध्य प्रदेश में डेढ़ फीसदी वोट नोटा को पड़े जो अपने आप में अहम था. साथ ही कई ऐसी सीटें रहीं जहां जीत का अंतर 100 से ज्यादा या उससे भी कम रहा. अगर 2013 के चुनावों को देखें तो 15 साल से सत्ता में दूर कांग्रेस के लिए करीब 10 फीसदी वोट शेयर के अंतर को कम करना इतना आसन नहीं था. लेकिन स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ केंद्र सरकार द्वारा एससी/एसटी एक्ट में संशोधन और प्रमोशन में आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सवर्णों और कर्मचारियों में आक्रोश भी एक अहम फैक्टर रहा जिससे मतदान प्रतिशत में बढ़ोत्तरी के साथ ही कांग्रेस को बीजेपी के करीब वोट प्रतिशत हासिल करने में मदद मिली. 2018 के चुनावों में बीजेपी का वोट प्रतिशत 41.00 फीसदी रहा और उसे 109 सीटें हासिल हुईं. जबकि कांग्रेस ने पिछली बार के गैप को खत्म करते हुए अपने वोट शेयर को 40.9 फीसदी तक पहुंचाने में सफलता हासिल की.

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एससी/एसटी एक्ट को लेकर बुलाए गए भारत बंद के दौरान जमकर हुई हिंसा ने केंद्र सरकार को हिलाकर रख दिया था. इसके बाद केंद्र सरकार संशोधन विधेयक लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया. जिसके बाद सवर्ण समाज और उससे जुड़े संगठन आक्रोशित हो उठे. यूपी समेत मध्य प्रदेश में भी संशोधन का जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया गया. सवर्ण संगठनों ने चेतावनी देते हुए कहा था कि वे इसका सबक चुनाव में नोटा का बटन दबाकर सिखाएंगे. मध्य प्रदेश में तो सपाक्स (सामान्य पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक समुदाय के शासकीय सेवकों की पार्टी) का गठन कर बकायदे चुनाव मैदान में पार्टी तक उतार दिए गए. यही वजह रही कि करीब 63 से ज्यादा सीटों पर कांटे की टक्कर देखने को मिली. नोटा और सपाक्स प्रत्याशियों ने बीजेपी की गणित को बिगाड़ दिया जिसका फायदा कांग्रेस को मिला.

आप, सपा और राकांपा पर भारी नोटा

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में वोट प्रतिशत के मामले में आप, सपा और राकांपा समेत कई सियासी दलों पर नोटा भारी पड़ा है. चुनाव आयोग की वेबसाइट पर जारी आंकड़ों के मुताबिक पांच राज्यों में आधे फीसदी से लेकर 2.1 फीसदी तक वोट नोटा के पक्ष में पड़े. सबसे कम मिजोरम में 0.5 फीसदी वोट नोटा को गए तो सबसे ज्यादा 2.1 फीसदी छत्तीसगढ़ में पड़े. मध्यप्रदेश में 1.5, राजस्थान 1.3 और तेलंगाना में नोट के पक्ष में 1.1 फीसदी लोगों ने बटन दबाया.

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