“बहुमूल्य जीवन को व्यर्थ की चर्चाओं में न बिताएं”-व्यास श्रवणानंद

प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। सत्य प्राप्ति की सफलता के लिए ही धार्मिक अनुष्ठानों में मंगलाचरण होता है। राजा परीक्षित मृत्यु निकट होने पर भी तप, श्रवण, विधान और पिंतन में लीन है।
स्वयं भगवान ने गर्भ में जिसकी रवाही नहीं किया बल्कि स्वयं भी गर्भ में रहे, उन परीक्षित महाराज को आखिर क्या चाहिए।
लोक हित, माया यस की चिन्ता पर्चा यशान प्राप्ति कीही उनकी जिज्ञासा है। भक्त है, भक्त संतों से मिलता है तो वह अपनी जिवासा शान्त करता है।
जब तक संसार है तब तक पर्या है। उक्त बाते नौ दिवसीय आराधना महोत्सव में विख्यात कथा व्यास स्वामी श्रमणानंद जी महाराज ने श्री शंकराचार्य आश्रम में श्रीमद्भागवत महापुराण कथा में बताया। उन्होंने कहा कि जिसमा साम्राज्य सम्पूर्ण धरती पर रहा ऐसे भी राणा के नाम की आज पर्चा भी नहीं होती-यह सब निज कर्मों का फल है।
मनुष्य जन्म का लाभ यही है कि केवल मारायण (भगवान) के नाम का स्मरण करें-‘बहुमूल्य जीवन को गार्थ की पर्याओं में न विताएं पूज्य श्रीमण्योतिष्पीठाधीश्वर जगगुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती जी
महाराज ने अपने आशीर्वपन में बताया कि सनातन वैदिक धर्म र सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार के लिए ही भगवान पनामौलि शंकर ने पृथ्वी पर दक्षिण भारत केरल प्रान्त के शलटी ग्राम में ढाई हजार वर्ष पूर्व अवतार लिया। उपनिपदों की दिव्य वाणी और गीता का निर्मल शान मा प्रचार-प्रसार पुनः जन सामान्य के समक्ष विस्तारित किया। भगवान आदिशंकराचार्य ने ही ज्योतिर्मठ, शारदामठ, भूगरीमठ, गोपद्धनमठ नाम से चार मठो की स्थापना किया। सभी मठ (पीटों) के कार्यक्षेत्री र कार्यपद्धति का आदेश/निर्देश दिया। उत्तरी भारत का सम्पूर्ण क्षेत्र
नीलांचल, अखण्ड पंजाब, सुमेराचल, उत्तरांचल, प्रिविष्टाचल, नेपालाचल, अरूणाचल, काश्मीर का सम्पूर्ण क्षेत्र ज्योतिर्मठ-जोशीमठ के ज्योतिष्पीठाधीश्वर के संरक्षण संचालन के अधीन
संचालित होता है जो कि गुरुपरम्परा-नियमानुसार मेरे द्वारा संचालित है और में स्वयं ज्योतिष्पीठाधीश्वर हूँ।
कार्यक्रम में दडी स्वामी विनोदानंद जी सरस्वती, पूर्व प्रधानाचार्य श्रीमज्योतिमीठ
संस्कृत महाविद्यालय श्रीशंकराचार्य आश्रम 40 शिपाचन उपाध्याय, आचार्य पं0 भेटेलात मिश्र,
वेदान्ताचार्य अपारी 40 विशुद्धानंद, मापारी आत्मानंद, ब्रह्मचारी जितेन्द्रजी, 10 पी0पी0
वाल, 10 सरिता मायाल, श्री सीताराम शर्मा (जयपुर), जगदीश प्रसाद मिश्र (लखनऊ)
आदि ने पूजा-आरती किया।



