हिन्दुस्तानी’ त्रैमासिक पत्रिका के ‘लोकनायक श्रीराम विशेषांक’ का विमोचन

( आनन्त पांडे ) पृयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। हिन्दुस्तानी एकेडेमी के तत्वावधान में 12 नवम्बर गुरुवार को ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’ प्रयागराज द्वाराप्रकाशित ‘हिन्दुस्तानी’ त्रैमासिक पत्रिका के ‘लोकनायक श्रीराम विशेषांक’ का ‘लोकार्पण समारोह’ का आयोजन ‘गाँधी सभागार’ में किया गया। कार्यक्रम का प्रारम्भ सरस्वती जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। मंचासीन अतिथियों का स्वागत हिन्दुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष डाॅ. उदय प्रताप सिंह ने किया। इस अवसर पर हिन्दुस्तानी एकेडेमी, प्रयागराज से प्रकाशित ‘हिन्दुस्तानी’ त्रैमासिक पत्रिका के ‘लोकनायक श्रीराम विशेषांक’ का विमोचन मंचासीन अतिथियों द्वारा किया गया। उक्त समारोह की अध्यक्षता करते हुए डाॅ. उदय प्रताप प्रताप सिंह ने कहा कि ‘लगभग पाँच सौ वर्षाें बाद एक मानसिक गुलामी से हम मुक्त हुए हैं। 4-5 सौ वर्षों में 76 बार संघर्ष हुआ तब हमारे राम मुक्त हुए। अयोध्या का एक सम्मानजनक हल निकला जिसको सभी मानते हैं। ऐसे क्षणों को साहित्यकार लिपिबद्ध करें। यह साहित्यकारों का कर्तव्य है। इसीक्रम में ‘हिन्दुस्तानी’ पत्रिका के लोकनायक श्रीराम विशेषांक का प्रकाशन एकेडेमी के द्वारा किया गया है। समारोह के मुख्य अतिथि प्रो. ईश्वरशरण विश्वकर्मा (अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग, प्रयागराज) ने कार्यक्रम में कहा कि ‘राम आज भी प्रासंगिक हैं। और आने वाले समय के लिये भी प्रासंगिक है। पाँच सौ वर्षों के समय में ऐसा कभी नहीं हुआ था जो आज अयोध्या में हो रहा है। सत्य स्थापित हुआ और अब राम की सत्यता के बारे में कोई प्रश्न करने वाला नहीं है। पूरे भूमण्डल में भारत वर्ष सर्वश्रेष्ठ है। सारे मानव कल्याण के कार्य भारत वर्ष में किये जाते हैं। ऐसा कोई गाँव नहीं जहाँ पूजा न होती हो, राम का नाम न लिया जाता हो और गाँव में कोई साधू न बनता हो। भारत वर्ष की चर्चा करेंगे तो राम की श्रेष्ठता को पायेंगे। समारोह के विशिष्ट अतिथि प्रो. अनुराग यादव ने कहा कि ‘राम शब्द जितना व्यापक, सरल, सरस दिखता है अगर हम उसकी गहराई में जाये ंतो राम शब्द में जो गहराई दिखाई देती उसे हम विरासत में पाते है कि लोक के भीतर राम शब्द कितनी गहराई तक जड़ा है। राम सबके भीतर अपने-अपने स्वरूप के साथ खड़े हैं। हिन्दुस्तान की कोई भाषा नहीं होगी जिसमें रामकथा न हों। आस्था से उपजें राम सबके राम हैं।’ लोकार्पण समारोह के मुख्य वक्ता प्रो. निरंजन सहाय (काशी विद्यापीठ, वाराणसी) ने ‘लोकनायक श्रीराम’ और हिन्दी साहित्य पर बात करते हुए कहा कि ‘बाल्मिकी के जो राम हैं वो देवता के रूप में चित्रित नहीं हैं। उन्हें मनुष्य के रूप में चित्रित किया गया है। बाल्मिकी के राम बार-बार दुखी होते हैं। उन्होंने कहा कि दैव ने हम पर विपत्ति डाली और पुरूषार्थ से हमने उसका मुकाबला किया। भवभूति के राम के मन में द्वंद्व आता संशय आता है। रामचरित मानस में राम ने देवता की जगह बना ली है। श्रीराम लोकनायक के रूप में हमारे मन में छाते हैं। कार्यक्रम का संचालन डाॅ. विनम्रसेन सिंह ने किया। कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन एकेडेमी के अध्यक्ष डाॅ. उदय प्रताप सिंह ने किया। कार्यक्रम में उपस्थित विद्वानों में प्रो. चंदा देवी, रामनरेश तिवारी ‘पिण्डीवासा’, मानेन्द्र प्रताप सिंह, मार्तन्ड सिंह, अजय मालवीय, उमेश श्रीवास्तव, कैलाश नाथ पाण्डेय, डाॅ. सुनील विक्रम सिंह, पियूष मिश्र , आदि के साथ शहर के अन्य रचनाकार एवं शोध छात्र भी उपस्थित थे।




