आज दुर्भाग्य से भारत में हर क्षेत्र में निर्णायक की भूमिका में ऐसे लोग स्थापित हैं, जिनको उस क्षेत्र का ज्ञान नहीं- शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द

(अनुराग शुक्ला) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। आज माघ मेला में अपने शिविर के पण्डाल में श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज ने उपस्थित सनातन धर्मावलम्बियों, श्रद्धालुओं को अपना आशीर्वचन प्रदान करते हुए कहा कि वेद शब्द का अर्थ है ज्ञान
सनातन धर्म और राष्ट्र भयंकर समस्याओं में उलझता जा रहा है।
वेद-पुरुष के शिरोभाग को उपनिषद् कहते हैं | उप (व्यवधानरहित), नि (सम्पूर्ण) षद् (ज्ञान) ही उसके अवयवार्थ हैं।
अर्थात् वह सर्वोत्तम ज्ञान जो ज्ञेय से अभिन्न एवम् देश, काल, वस्तु के परिच्छेद से रहित परिपूर्ण ब्रह्म है, ‘उपनिषद्’ पद का अभिप्रेत अर्थ है।
इसलिए जब तक ज्ञान के स्वरूप का ठीक-ठीक विचार नहीं कर लिया जायगा, तब-तक उपनिषद् क्या हैं ? यह बात स्पष्ट नहीं हो सकेगी। पूज्य शंकराचार्य भगवान ने कहा कि ज्ञान स्वत:प्रमाण है, परत:प्रमाण नहीं | इसका अभिप्राय यह है कि किसी भी पदार्थ का यथार्थ निश्चय करने में ज्ञान ही अन्तिम निर्णायक होता है। सम्पूर्ण ब्यवहार अपने ज्ञान के आधार पर ही चलता है
किसी भी विषय के होने या न होने का निर्णय करने में ज्ञान ही अन्तिम कारण होगा।
उदाहरण के लिए-विषय की सत्ता इन्द्रियों से, इन्द्रियों की मन से, मन की बुद्धि से और बुद्धि की ज्ञानस्वरूप आत्मा से निश्चित होती है |अज्ञान का अनुभव भी ज्ञान ही है।
तो ज्ञान को प्रमाणित करने के लिए क्या ज्ञान से भिन्न पदार्थ की आवश्यकता होगी ? कदापि नहीं पूज्य श्री ने कहा कि आज दुर्भाग्य से भारत में हर क्षेत्र में निर्णायक की भूमिका में ऐसे लोग स्थापित हैं, जिनको उस क्षेत्र या सम्बन्धित विषय की प्राथमिक जानकारी अर्थात् ज्ञान नहीं है फलत: सनातन धर्म और राष्ट्र भयंकर समस्याओं में उलझता जा रहा है
पूज्य शंकराचार्य भगवान से पूर्व काशी से पधारे भागवताचार्य डा० प्रभाकर त्रिपाठी जी एवम् पूज्य शंकराचार्य जी महाराज के निजी सचिव स्वामी बृज भूषण दास जी महाराज ने भी उपस्थित सनातन धर्मावलंबी श्रद्धालुओं को अपने सनातन धर्म के प्रति समर्पित एवम् दृढ़ रहकर अपने जीवन को मंगलमय एवम् सफल बनाने के लिए अपने पूज्य धर्माचार्यों, सन्त- महापुरुषों द्वारा बताये गये मार्ग का अनुसरण करने का आह्वान किया ।



