आज ऐसे लोग हैं, जिन्हें अपने गुरू और परम्परा का ही ज्ञान नहीं और सन्यासी व धर्माचार्य बने बैठे हैं- शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद

( अनुराग शुक्ला ) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। श्रीमद्ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती जी, जोशीमठ चमोली (हिमालय) ने अपने माघ मेला शिविर प्रयागराज में गुरू और शिष्य के प्रति सम्मान की भावना पर बोलते हुए कहा कि भगवान आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्मावलम्बी प्रकाण्ड विद्वान कुमारिल भट्ट से
शास्त्रार्थ करने की इच्छा प्रकट की। किन्तु कुमारिल भट्ट ने कहा कि मुझसे अपने गुरू के प्रति अपमान हो गया है इसके प्रायश्चित के लिए मैं तुषानल में जलकर भस्म हो रहा हूँ। स्वामी जी ने कहा कि आज ऐसे लोग हैं, जिन्हें अपने गुरू और परम्परा का ही ज्ञान नहीं है और इसका खण्डन भी करते हैं, सन्यासी व धर्माचार्य बने बैठे हैं।
इससे अधिक धर्म और गुरू का क्या अनादर हो सकता है? इन लोगों को पता ही नहीं है कि इनका गुरू कौन है और इनकी परम्परा क्या है? पूज्य शंकराचार्य जी ने बताया कि कुमारिल भट्ट ने आदि शंकराचार्य जी से कहा कि शास्त्रार्थ के लिए मेरे शिष्य मण्डन मिश्र से शास्त्रार्थ कर, उन्हें पराजित कर अपने साथ लीजिए और सनातन धर्म का प्रचार करिये। इसके बाद भगवान आदि
शंकराचार्य ने राजा सुधन्वा के साथ सनातन विरोधियों का संयमन किया ।श्रीमद्ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरूशंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती जी
महाराज ने प्रयाग में माघ-मेला का संदर्भ देते हुए बताया कि ऐसे ही अवसर पर महर्षि याज्ञवलक्य प्रतिवर्ष प्रयाग आते थे और भरद्वाज ऋषि के आग्रह पर व्याख्यान भी देते थे। इसी संदर्भ में पूज्य गोस्वामी जी ने लिखा है- ‘प्रतिसम्वत् अस होइ अनन्दा। ब्रह्मा जी ने भी प्रयाग में ही गंगा जी के किनारे दस अश्वमेघ यज्ञ किया था, उसी स्थल को आज भी दशाश्वमेघ घाट कहते हैं। शिविर में प्रमुख रूप से दण्डीस्वामी विनोदानंद सरस्वती जी, पूर्व प्रधानाचार्य ज्योतिष्ठपीठ संस्कृत महाविद्यालय पं0 शिवार्चन उपाध्याय, आचार्य विपिन मिश्र,
प्रधानाचार्य सन्तोष जी, पं0 मनीष जी आदि सहित बड़ी संख्या में भक्त एवं दर्शनार्थी
उपस्थित रहे।



