ज्ञान का जन्म नहीं होता, अन्त:करण की शुद्ध स्थिति अथवा निर्विषयता भी ज्ञान की जननी नहीं है- शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद

( अनुराग शुक्ला) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। माघ मेला त्रिवेणी मार्ग पर काशी सुमेरु पीठ के शिविर में आज प्रवचन के क्रम में श्री काशी सुमेरु पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि ज्ञान हेतुफलात्मक नहीं है।
ज्ञान की उत्पत्ति स्वीकार करने पर उसके प्रागभाव की अर्थात् उसके उत्पत्ति के पहले की स्थिति बतानी पड़ेगी।
परन्तु ज्ञान के बिना उसकी भी स्थिति नहीं बतलाई जा सकती।
अभिप्राय यह है कि ज्ञान का जन्म नहीं होता ।
अन्त:करण की शुद्ध स्थिति अथवा निर्विषयता भी ज्ञान की जननी नहीं है, विचार की जननी है। विचार के द्वारा वृत्यात्मक ज्ञान परिपुष्ट होता है और दृढ़ होने पर वह अज्ञान का नहीं, अज्ञान-भ्रान्ति का निवर्तक होता है। शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद ने बताया प्रक्रिया ग्रंथों के अनुसार यह वृत्यात्मक ज्ञान भी दूसरे क्षण में नहीं रहता है।
यह क्षणसहित वृत्ति को और अपने ब्यक्तित्व को भी बाधित कर देता है। जब यह स्वयम् बाधित होता है तब कोई अपना कार्य या फल छोड़कर बाधित हो और वह ज्ञान वृत्ति की निवृत्ति के अनन्तर रहे, तब तो द्वैत बना ही रहा । इसलिए हेतुता और फलता की कल्पना ही मिटती है ।हेतु और फल तो कुछ है ही नहीं, जिनकी ज्ञान से निवृत्ति होती हो।
अज्ञान घट के उपादान कारण मृत्तिका के समान जगत का उपादान नहीं है वह तो जगत की ब्यवस्था की सिद्धि के लिए कल्पित है।
अज्ञान है-यह कल्पना भी ज्ञान का विवर्त ही है ।
इसलिए ज्ञान वृत्ति से अज्ञान का ध्वंस नहीं होता, प्रत्युत कल्पना ही बाधित होती है।
पूज्य शंकराचार्य भगवान के पूर्व पंख दिनेश जी मिश्र एवम् स्वामी बृज भूषण दास जी महाराज ने अपने प्रवचन के माध्यम से उपस्थित सनातन धर्मावलम्बी श्रद्धालुओं को मार्गदर्शन प्रदान किया।




