अद्भुत है काशी जहां श्मशान में चिता की राख से होली खेली जाती है

मान्यता है भूत भावन बाबा विश्वनाथ स्वयं अपने भूत प्रेत के साथ होली खेलने शमशान पहुंचते हैं ।
वाराणसी (अनुराग दर्शन समाचार )। अद्भुत है काशी जहां श्मशान में भी होली खेली जाती है। विराग मे भी राग का भाव आता है विरक्ति मे भी आसक्ति की खोज की जाती है । जब जीवन के सभी रंग छूट जाते हैं ।तब जीवन मे एक नया रंग भरने का काम काशी मे होता है । न अबीर गुलाल चिता की राख तो है। चिता की राख में जीवन के रंगो को तलाशने का काम यदि दुनियाँ में कही हो सकता है तो वह काशी है । रंग भरी एकादशी के दुसरे दिन काशी के श्मशान मणिकर्णिका घाट पर चिता की राख से होली खेली गयी । ऐसी मान्यता है कि भूत भावन बाबा विश्वनाथ स्वयं अपने भूत प्रेत के साथ होली खेलने शमशान पहुंचते हैं । तब से वह परम्परा आज भी कायम है । इस अवसर पर लोक परम्पराओ को जिवित करने हेतु एक लोक गीत है जो गाया जाता है। खेले मसाने मे होरी दिगम्बर खेले मसाने मे होरी ,
भूत प्रेत बटोरी दिगम्बर, खेले मसाने मे होरी ,
लखि सुन्दर फगुनी छटा के, मन मे रंग गुलाल हटा के ,
चिता भसम भर झोरी, खेले मसाने मे होरी ,
गोप न गोपी श्याम न राधा, ना कोई रोक ना कोई बाधा ,
ना साजन ना गोरी, दिगम्बर खेले मसाने मे होरी ,
नाचत गावत डमरू धारी, छोडे गरल पिचकारी ,
बीतै प्रेत अघोरी, दिगम्बर खेले मसाने मे होरी ,
भूत नाथ की मंगल होरी, देखि सिहाय बिरज की गोरी ,
धन धन नाथ अघोरी, दिगम्बर खेले मसाने मे होरी ।



