तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली मेें भगवान ऋषभदेव का हुआ मस्तकाभिषेक

(विनय मिश्रा )प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली (अंदावा) प्रयाग में गुरुवार को तपस्थली स्थापना के २० वर्ष पूर्ण होने पर भगवान ऋषभदेव के महामस्तकाभिषेक का कार्यक्रम आयोजित हुआ। पंडित जीवन प्रकाश हस्तिनापुर के निर्देशन में अंतर्मना तपस्वी आचार्य प्रसन्न सागर, आचार्य विपुल सागर, आचार्य भद्रबाहु सागर, मुनि पीयूष सागर, मुनि भरतेश् सागर एवं ऐलक् पर्व सागर के सानिध्य में मंत्रोचार द्वारा श्रद्धालुओ ने पंचामृत अभिषेक किया।
प्रथम कलश का सौभाग्य कैलाश चंद्र जैन लखनऊ सपरिवार को मिला। इस अवसर पर पीठाधीश रविंद्रकीर्ति स्वामी ने बताया की गणिनी आर्यका ज्ञानमती की प्रेरणा से २००१ में इस तीर्थ का निर्माण कराया गया। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जिनका जन्म अयोध्या में हुआ था तथा प्रयाग मे अक्षयवट वृक्ष के नीचे ज्ञान एवं तप किया था। इसी याद में तपस्थली का निर्माण हुआ जो सत्य अहिंसा का संदेश दे रही है। श्रद्धालुओ को संबोधित करते हुए आचार्य प्रसन्न सागर ने कहा कि दुनिया में जितने भी पाप और अपराध हो रहे हैं, सब सोए हुए लोगों द्वारा किए जा रहे हैं। जागा हुआ इंसान कभी पाप नहीं कर सकता।आचार्य श्री ने कहा कि होश में व्यक्ति किसी को गाली नहीं दे सकता, किसी का नुकसान नहीं कर सकता है। जीवन में जिन्होंने भी कुछ पाया जागकर ही पाया है। इंसान को मूर्छा से ऊपर उठकर प्रभु के कार्य में लगना चाहिए। इससे मन की शांति और तन की शक्ति प्राप्त होती है। उन्होंने अनुयायियों को जीवन का महत्व समझाते हुए उसे व्यर्थ में नष्ट न करने को कहा। कहा कि चित्त की चौकसी ही परम ज्योति को पाने का द्वार है। प्रभु बनना है, तो मन को मारना पड़ेगा। केवल तन को मारना पर्याप्त नहीं होगा। मन को मार कर ही कोई वर्धमान महावीर स्वामी बन जाता है। सिकंदर की तरह विश्व विजेता तो इस पृथ्वी पर बहुत हुए, लेकिन मन के किले पर फतह करने वाले महावीर कुछ ही हुए। महावीर आत्म विजयी होकर विश्व के मसीहा बन गए और सिकंदर विश्व विजेता होकर भी स्वयं से हार गया।
अंत में मुनि पीयूष सागर ने प्रयाग की महिमा बताते हुए कहा कि यही प्रयाग की वो पावन भूमि है जहाँ प्रथम बार दिगम्बर जैन मुनि का जन्म हुआ था। इस अवसर पर दूरदराज से काफी श्रद्धालुओ सम्मिलित हुए।




