पर्यावरण दिवस हम क्यों मनाते हैं? : ज्योति श्रीवास्तव की कलम से

हम 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं सर्वप्रथम 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा द्वारा आयोजित सम्मेलन में वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के लिए राजनीतिक और सामाजिक जागृति लाने के उद्देश्य से चर्चा की गई 1974 में 5 जून को प्रथम विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया।
पर्यावरण दिवस हम क्यों मनाते हैं? इसको जानने से पहले हमें पर्यावरण के बारे में जानना होगा। पर्यावरण शब्द अंग्रेजी के इन्वायरमेंट का हिंदी रूपांतरण है अर्थात हमारे चारों ओर का एक घेरा। वर्तमान में एक और वैज्ञानिक शब्द चलन में आया है जिसे हम पारिस्थितिकी कहते हैं इकोसिस्टम के भारी भरकम ज्ञान के जाने के बजाए आम आदमी को सीधे सरल भाषा में यह बात समझ आती है कि हमारे चारों ओर हवा पानी भूमि प्रकाश हमारे जंगल हमारे पर्वत पहाड़ जो संपूर्ण प्रकृति है वही हमारा पर्यावरण है।
दुनिया की आबादी लगभग 7 अरब से ऊपर की है और इन सात अरब लोगों के सामूहिक चेतना का एक संगठन जिसे हम सहज भाषा में विश्व पंचायत का नाम दे सकते हैं अर्थात संयुक्त राष्ट्र संघ। संयुक्त राष्ट्र संघ को जब भी लगता है की कोई भी समस्या वैश्विक स्तर पर विकट हो रही है तब वैश्विक स्तर पर उसका समाधान खोजने लगता है इसी कड़ी में 1974 से हम पर्यावरण दिवस मनाते आ रहे हैं इसी बीच 1985 में एक बात और सामने आई की पृथ्वी के ओजोन लेयर में छेद हो रहा है ओजोन लेयर सूर्य के पराबैगनी किरणों को फिल्टर करने का काम करती है हमारी पृथ्वी के जीव जंतु वनस्पतियां जब डायरेक्ट पराबैगनी किरणों के संपर्क में आती हैं तब उन्हें काफी नुकसान पहुंचता है। कहते हैं परिस्थिति सबसे बड़ा विद्यालय है और समय सबसे बड़ा शिक्षक बीते एक डेढ़ वर्षों में दुनिया जिस जैविक त्रासदी से जूझ रही है और इस महामारी का विकट संकट अभी भी टला नहीं है इस संकट ने हमारी छठी इंद्री भी खोल दी है हम जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करते जाते हैं कंक्रीट के जंगल खड़े करते जाते हैं भौतिक समृद्धि के नाम पर विनाश की ओर आगे बढ़ रहे हैं वर्तमान समय ने इस बात को हमें पूरी तरह बता दिया है पिछले वर्ष लॉकडाउन के बाद कुछ स्थानों से लगभग 200 300 किलोमीटर दूर से भी हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं नजर आ रही थी सबको एहसास हुआ की प्रकृति ने हमें कितने सुंदर सुंदर उपहार दिए हैं और विकास के नाम पर हम इनका नाश कर रहे हैं। कहने का तात्पर्य है कि विकास पर्यावरण को क्षति पहुंचाए बिना होना चाहिए । आज हम तथाकथित विकास के एक ऐसे दौर में पहुंच चुके हैं जहां लगातार बढ़ रहा पर्यावरण प्रदूषण हमारे अस्तित्व को अनवरत चुनौती दे रहा है प्रकृति से दूर रहकर एक तरफा विकास का परिणाम हम सब ने देख लिया है वायु प्रदूषण जल प्रदूषण ध्वनि प्रदूषण मृदा प्रदूषण रेडियो एक्टिव प्रदूषण ओजोन लेयर में छेद और अम्लीय वर्षा का अत्यंत विनाशकारी स्वरूप हर विवेकशील मानव को परेशान कर रहा है 2014 की केदारनाथ की प्राकृतिक आपदा अभी हम बिसरा नहीं पाए हैं लंबे समय तक का विनाशकारी विकास हमारे पर्यावरण के लिए बहुत ही महंगा साबित हुआ है। आज के दौर में हमें प्रगति और प्रकृति को साथ साथ लेकर चलना होगा। भारतीय परिवेश में पर्यावरण सुरक्षा की बात आदिकाल से ही की जाती रही है हमारे वेद सदा ही हमें पर्यावरण सुरक्षा के लिए प्रेरित करते हैं वेदों में नदियों को मां समान बताया गया है और जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं उस वसुधा को भी मां कहा गया है हमारे यहां जल वायु अग्नि आकाश पृथ्वी पर्यावरण के सभी अंगों की पूजा की बात कही गई है। हम वृक्षों की भी पूजा करते हैं पीपल बरगद नीम आम अशोक शमी तुलसी केला अनार आदि हमारे पूजनीय वृक्ष है बरगद वृक्ष की महत्ता तो यहां तक है कि ऐसा मानते हैं की प्रयागराज में संगम के निकट जो अकबर का किला है उसके भीतर एक वटवृक्ष सतयुग का है। यह एक किवदंती हो सकती है किंतु एक प्रेरणा तो है ही की बरगद सबसे दीर्घ जीवी वृक्ष है और आध्यात्मिक संदर्भ में इसकी पूजा उपासना से मानव दीर्घ जीवन का वरदान पा सकता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने पर्यावरण को धर्म से इसी उद्देश्य से जुड़ा होगा कि मानव जाति पर्यावरण का संरक्षण करती रहे। अतः बात वैज्ञानिक और धार्मिक सभी दृष्टिकोण से हम हमारे जीवन की सुरक्षा तभी कर सकते हैं जब हम पर्यावरण को सुरक्षित रखने का प्रयास करें। तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस में एक जगह प्रसंग आता है जो हमें पर्यावरण सुरक्षा का संदेश देता है।
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक संग जग पंचानन।। खग मृग सहज बयरू बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीत बढ़ाई।।
( ज्योति श्रीवास्तव )




