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अक्षय-तृतीया पर्व पर जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान ने एक वर्ष की पूर्ण तपस्या करने के पश्चात इक्षु गन्ने के रस से आहार लिया था

( विनय मिश्रा ) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। अक्षय-तृतीया पर्व को केवल हिन्दू धर्म ही नहीं बल्कि जैन धर्मावलम्बी श्रद्धालु भी एक बड़े धार्मिक उत्सव के रूप में मनाते हैं। इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान ने एक वर्ष की पूर्ण तपस्या करने के पश्चात इक्षु गन्ने के रस से आहार लिया था। जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर श्री आदिनाथ भगवान ने सत्य व अहिंसा का प्रचार करने एवं अपने कर्म बंधनों को तोड़ने के लिए संसार के भौतिक एवं पारिवारिक सुखों का त्याग कर अक्षय-तृतीया के दिन ही जैन वैराग्य को अंगीकार किया था। आज भी जैन धर्मावलंबी वर्षीतप की आराधना कर अपने को धन्य समझते हैं, यह तपस्या प्रति वर्ष वैशाख मास के शुक्लपक्ष की अक्षय तृतीया के दिन पारायण कर पूर्ण की जाती है।संयम जीवनयापन करने के लिए इस प्रकार की धार्मिक क्रिया करने से मन को शान्त, विचारों में शुद्धता, धार्मिक प्रवृत्रियों में रुचि और कर्मों को काटने में सहयोग मिलता है। इसी कारण इस अक्षय तृतीया का जैन धर्म में विशेष धार्मिक महत्व समझा जाता है। मन, वचन एवं श्रद्धा से वर्षीतप करने वाले को महान समझा जाता है। जैन धार्मिक चैनेल पारस एवं जिनवानी के माध्यम से जैन साधु संतो ने बताया कि अक्षय तृतीया के दिन जैन धर्म मे आहार दान किया जाता हैं एवं आहार दान की विशेषता के बारे में बताया।

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