शंकराचार्य जी का पूरा जीवन सनातन धर्म की रक्षा एवं राष्ट्र कल्याण के लिए समर्पित था-नरेंद्रानंद जी

वाराणसी। आज काशी सुमेरु पीठ में सुमेरु पीठ के ब्रह्मलीन जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी शंकरानंद सरस्वती जी महाराज का 26वाँ निर्माण महोत्सव सुमेरु पीठ के वर्तमान पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती जी महाराज के पावन सानिध्य में।

संपन्न हुआ निर्माण महोत्सव प्रातः चतुर्वेद स्वस्तिवाचन से प्रारंभ हुआ एवं भगवान श्री चंद्रमौलेश्वर महादेव का रुद्राभिषेक एवं राजराजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी का लक्षार्चन किया गया इसके पश्चात ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी शंकरानंद सरस्वती जी की प्रतिमा प्रतिमा पर संतो एवं विद्वान जनों ने माल्यार्पण किया।

इस पावन अवसर पर विद्वतजन एवं संत समाज की पावन उपस्थिति में श्रद्धांजलि सभा हुआ। श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए पूज्य शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती जी महाराज ने कहा ब्रह्मलीन शंकराचार्य जी का पूरा जीवन सनातन धर्म की रक्षा एवं राष्ट्र कल्याण के लिए समर्पित था जब जब राष्ट्र एवं समाज पर संकट उत्पन्न होता है तो संत ही उस समय समाज का मार्गदर्शन कर संकट से मुक्त होने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

विद्युत गोष्ठी में स्वामी परमेश्वर आनंद सरस्वती जी महाराज ने कहा कि ब्रह्मलीन शंकराचार्य जी वेदों अंग में वेदांग न्याय मीमांसा व्याकरण छंद न्याय के साथ-साथ मीमांसा के उद्भट विद्वान थे वे बड़े-बड़े विद्वानों की शंकाओं का चुटकी बजाते शास्त्र सम्मत समाधान करते थे।
भारत के बड़े-बड़े विद्वान उनके समाधान से दंग रह जाते थे सार्वभौम विश्व गुरु स्वामी करुणा नंद सरस्वती जी महाराज ने कहा कि देवलोक संबंध ब्रह्मलोक रूद्र लोक परलोक मृत्युलोक और कर्म भूमि है प्रेतलोक एवं नरक लोक दुख से परिपूर्ण हैं मृत्युलोक का अधिकार सर्व लोक हितकर है क्योंकि लोक में देखा जाए तो शुभ अशुभ कर्मों से अन्य दिव्य लोक प्राप्त करते हैं इसलिए जीव को अहर्निश संत संगत कर गुरुओं का मार्गदर्शन ले संतों की संगति से जीवन का कल्याण होता है।
जड़रूप जीवभूत चेतनमयी है अज्ञान पूर्णरूप से जड़रूप धारण करके तदादृष्टि को प्रकट करता है । चेतन स्रोत रूपिणी होकर जीव स्वरुप में प्रवेश करता है चेतन नदी जड़मय प्रज्ञा पर्वत है। पर्वत से निकलकर उद्भिज स्वेदज अंडज जरायुज रूपी सरलता मैं बहती हुई मनुष्य लोक रूपी तलहटी में जीव पहुंचता है विद्वत् गोष्ठी में स्वामी अखंडानंद तीर्थ जी महाराज ने कहा कि ब्रह्मलीन शंकराचार्य जी ब्रह्म मुहूर्त में गंगा स्नान एवं गंगाजल का पान करके हम सन्यासियों को उपदेश करते थे।
एवं हम संतो के अज्ञानता का भेदन करते थे। आसाम मेघालय बांग्लादेश के बॉर्डर से प्रभावित प्रखर हिंदूवादी संत श्यामानंद ब्रह्मचारी जी महाराज ने कहा कि ब्रह्मलीन शंकराचार्य जी ने हमारे क्षेत्र में आकर सनातन हिंदू धर्म को बल प्रदान किया और सनातन धर्म विरोधियों को मुंहतोड़ जवाब देकर हिंदुत्व की शक्तियों को प्रबलता एवं प्रखरता प्रदान किया आज यदि वह हमारे बीच नहीं गए होते तो हम आज हिंदू नहीं ईसाई या मुसलमान होते ब्रह्मलीन शंकराचार्य जी की विचारधारा एवं वाणी आज भी हमारे जीवन मैं गुंजायमान होती रहती है जो हमें अपने धर्म पर बने रहने का संबल प्रदान करती है विद्युत गोष्ठी में अखिल भारतीय विद्वत् परिषद के महासचिव डॉक्टर कामेश्वर उपाध्याय ने कहा कि ब्रह्मलीन शंकराचार्य जी शास्त्रों के प्रति अनुराग और सनातन धर्म के कट्टर प्रबल समर्थक होने के साथ-साथ हिंदू धर्म के महाऋषि थे।
वेदों का ज्ञान एवं न्याय का निरूपण करते थे। तब बड़े-बड़े नास्तिकों का गर्व चूर हो जाता था सरल सुगम शब्दों से तर्क पूर्ण समाधान कर्मचारियों का चित्त बुद्धि रहते थे जिससे वह नास्तिक सनातन धर्म के लिए समर्पित होते थे संतों का स्वागत गिरीडीह, झारखंड के श्याम बिहारी सिंह ने माल्यार्पण कर किया विद्वत् गोष्ठी का संचालन स्वामी भूषण जी महाराज ने किया।
तत्पश्चात भंडारे में चतुर्थ संप्रदाय के संतों ने फलाहारी ग्रहण किया विजयराम दास जी महाराज ने समस्त संतो को तिलक लगाकर माल्यार्पण किया विद्वत् गोष्ठी में प्रमुख रूप से आनंद प्रकाश त्रिपाठी, जय प्रकाश त्रिपाठी, रामपुर कुमार मिश्र, डॉक्टर लक्ष्मण तिवारी, डॉ कमलेश राय, महंत विमल देव आश्रम, महंत इंद्र प्रकाश आश्रम, महंत अवध बिहारी दास, स्वामी दुर्गेशानंद तीर्थ, सिद्धेश्वर भारती, जूना अखाड़ा से श्री महंत, थानापति हीरा पुरी जी, महाराज निरंजनी अखाड़े से परमात्मानंदपुरी, राम जानकी मठ अस्सी से राम लोचन दास जी महाराज, आदि संतो की पावन उपस्थिति रही।




