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अपनी आत्मा में ही रमण करना उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म- आचार्य विपुल सागर

प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। दिगंबर जैन समाज के दसलक्षण पर्व के अंतिम दिन मंगलवार को उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की पूजा अर्चना की गयी। पर्व के अंतिम दिन अनंत चतुर्दशी के दिन जैन अनुयाईओं ने श्रद्धापूर्वक व्रत रखे। अनंत चतुर्दशी पर जीरो रोड, कर्नलगंज, बेनीगंज, नैनी एवं तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली स्थित जैन मंदिरो में भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा कोरोना महामारी से मुक्ति की भावना से की गयी । इस अवसर पर मंदिरो में श्रद्धालुओं ने केसरिया वस्त्रो में शासन द्वारा जारी गाइडलाइन का पालन कर उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की पूजा तथा जैन धर्म के बारहवें तीर्थंकर वासपूज्य भगवान के मोक्षकल्याण के अवसर पर नारियल का लड्डू अर्पित किया। घरों में पूजा अर्चना कर रहे धर्मावलंबियों ने आचार्यश्री विद्या सागर, प्रमाण सागर, सुधा सागर एवं साध्वी ज्ञानमती माता जी के ऑनलाइन एवं धार्मिक चैनलो के माध्यम से प्रवचन सुनकर धर्मलाभ लिया।
तीर्थंकर ऋषबदेव तपस्थली में विराजमान आचार्य विपुल सागर ने उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म के बारे में समझाया कि वर्तमान में व्यक्ति ब्रह्मचर्य का महत्व नहीं जानता है और संयम सदाचार से दूर होता जा रहा है। इसलिए व्यभिचार फैलता जा रहा है। आत्मा में रमण करना ही उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म है। उन्होंने कहा कि मन पर नियंत्रण रखकर काम वासना जागृत करने वाले निमित्तों से दूर रहना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन करने से पाप का नाश होता है और पुण्य का संचय होता है। आचार्य भरतेश सागर ने बताया कि उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। आत्मा की उपलब्धि के लिए किया जाने वाला आचरण ही ब्रह्मचर्य है। साधक दुनिया के मायाजाल से हटकर अपने आत्मतत्त्व में लीं होकर ब्रह्मचर्य की साधना करता हैं। राजेश कुमार जैन ने बताया कि संयम और आत्मशुद्धि के महापर्व के समापन पर ३ सितम्बर को क्षमावाणी पर्व मनाया जायेगा। क्षमावाणी पर्व पर जैन समाज एक दूसरे से क्षमा याचना करेंगे अथार्त पूरे वर्ष में हमसे जो भूल हुई है उसके लिए क्षमा प्राथी हैं। पर्युषण पर्व का महत्व ही क्षमा याचना हैं।

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