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कात्यायनी देवी की उपासना करने वाला भक्त धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- इन चारो पुरुषार्थों की प्राप्ति कर लेता

(अनुराग शुक्ला) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार)। नवरात्रि मैं समुचित ब्रह्मांड में मां की स्तुति और पूजा आराधना जोर शोर से चल रही है वहीं बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माँ कात्यायनी अदृश्य जगत को चलाती हैं। छठे नवरात्रि में मां कात्यायनी के स्वरूप की पूजा की जाती है। मां कात्यायनी ऋषि कात्यायन की तपस्या के फलस्वरुप उनकी पुत्री के रूप में प्रकट हुई थीं और महिषासुर का
वध किया था। असुर केवल उस समय ही नहीं, आज भी हैं, क्योंकि असुर मनुष्य की दुवृत्तियों को कहा गया है। मनुष्य के अंदर हिंसा और पापवृत्ति समाप्त होने पर वह अंतःकरण से शुद्ध होकर भगवती कृपा का पात्र बनता है
और मोक्ष प्राप्त करता है। वो जगत जो अदृश्य है, हमारी
इंद्रियां भी उसका अनुभव नहीं कर सकतीं और जो कल्पना से परे है,वही जगतमां कात्यायनी के प्रताप से संबंधित है। मां के कात्यायनी रुप का ध्यान, पूजन
करने से भक्त के आंतरिक सूक्ष्म जगत में चल रही नकारात्मकता का नाश होकर सकारात्मकता का
विकास होता है। सुनहरे और चमकीले वर्णवाली, चार भुजाओं वाली और रत्नाभूषणों से अलंकृत कात्यायनी देवी खूखार और झपट पड़ने वाली मुद्रा में रहने वाले सिंह पर सवार रहती हैं। इनका आभामंडल विभिन्न देवों के तेज अंशों से मिश्रित इंद्रधनुषी छटा देता है। माता
कात्यायनी की दाहिनी ओर की ऊपर वाली भुजा अभय देने वाली मुद्रा में और नीचे वाली भुजा वर देने वाली मुद्रा में रहती है। बाईं ओर की ऊपर वाली भुजा में वे चंद्रहास खड्ग धारण करती हैं और नीचे वाली भुजा में कमल का फूल रखती हैं। एकाग्रचित और पूर्ण समर्पित भाव से
कात्यायनी देवी की उपासना करने वाला भक्त बड़ी सहजता से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- इन चारो पुरुषार्थों की प्राप्ति कर लेता है। साधक को मां दर्शन देकर कृतार्थ
करती हैं। वह इस लोक में रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव प्राप्त करता है। उसके रोग शोक संताप,भय के साथ जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।

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