अयोध्या के राजसिंहासन पर राम की चरणपादुका को आसीन कर भारत ने चलाया राज

(अनुराग शुक्ला ) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। कथा रामराज की रामलीला का पांचवां दिन आज वन जा कर राम को पुनः अयोध्या वापस लाने , राज उन्हें सौंप कर अयोध्या का राजा बनाने को दृढ़प्रतिज्ञ भरत राज दरबार में इसकी घोषणा करते हैं । और सभी इस बात की सराहना के साथ इस पर अपनी सहमति व्यक्त करते हैं । रानियों , राज परिवार , और अयोध्या के समस्त वरिष्ठ जनों के साथ सैन्य समूह , और सारे राज-वैभव को ले कर भरत का चित्रकूट को प्रस्थान होता है। इसका समाचार निषादराज को मिलाता है । सन्देह हुआ भरत का सेना के साथ राम के पास जाने के उद्देश्य पर । वे सख्तभाव से भरत से मिलते हैं । उनके पवित्र उद्देश्य पर नतमस्तक हो कर उनके साथ चल पड़ते हैं । उधर सेना आदि के कोलाहल पर लक्ष्मण ,भरत के आने के उद्देश्य पर राम के अहित की बात सोच स्वयम को भरत से युद्ध करने तक कि बात राम से कह डाले । वही राम ने उन्हें शांत किया। भरत की भावना की पवित्रता पर संदेह न करने की बात कही । समस्त परिवार राजमाताओं,सेना,अयोधया के वरिष्ठ नागरिकों के साथ मिल कर राम से अयोध्या लौटने की प्रार्थना कर राज करने का अनुनय पर राम का दृढ़ता से पिता के वचन का पालन करने का उनका कर्तव्य आदि के माध्यम से वनवास की अवधि के बाद ही अयोध्या लौटने का बहुत ही मोहक मंचन हुआ।दर्शक भावविह्वल हुए दोनों भाइयों के प्रेरणाप्रद भाव से ।
उधर भरत का निश्चय अयोध्या के राजसिंहासन पर राम की चरणपादुका को आसीन कर , स्वयम नंदीग्राम में समस्त सुख वैभव से मुक्त जीवन जीते हुए राज चलाने की घोषणा की राम की पादुका को सर पर रख अयोध्या को प्रस्थान किया।चरित्र और भतृप्रेम के अद्भुत उदाहरण बन गए भरत । चित्रकूट से आगे बढें राम । वहां से अगस्त्य ऋषि के आश्रम , अत्रि – अनसूया से मिलना , अनसूया का सीता को दिव्यवस्त्र प्रदान कर पातिव्रत धर्म
की सीख आदि अत्यंत मोहक प्रसंगों का मंचन हुआ ।



