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माँ सिद्धिदात्री सिद्धियां प्रदान कर भक्तों के पूरे करती हैं मनोरथ

( अनुराग शुक्ला ) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। माँ के जिस नौवें स्वरूप की पूजा की जाती है, उसे सिद्धिदात्री कहा जाता है। मां सिद्धिदात्री सिद्धियां प्रदान कर भक्तों के मनोरथ पूरे करती हैं। मां सिद्धिदात्री अपने नाम से ही
यह परिभाषित करती हैं कि वे सिद्धियों को देने वाली देवी हैं। देवी पुराण में मां स्वयं कहती हैं कि जो लोग वास्तविक भक्ति को जानकर मेरी आराधना करते हैं, वे मुझमें और मैं उनमें स्थित रहती हूं। वे मेरे द्वारा प्रदान की
गई सिद्धियों को स्वतः प्राप्त कर लेते हैं। मां सिद्धिदात्री के पूर्ण कृपापात्र बनने के लिए हमें शुद्ध अंत:करण और सभी विद्याओं का सार ग्रहण करने की आवश्यकता होती है। शुद्ध अंतःकरण वाले मोक्षार्थियों को आत्मकल्याण की प्राप्ति में निरंतर प्रयत्नशील रहना चाहिए, यही संदेश मां का नवां स्वरूपनवरात्रि पर पूरी मनुष्य जाति को प्रदान करता है। देवी भागवत पुराण के अनुसार, भगवान शिव ने भी इन्हीं की कृपा से सिद्धियों को प्राप्त किया
था। इन्हीं की कृपा से भगवान शिव का आधा शरीर देवी
का हुआ और वे लोक में अर्द्धनारीश्वर के रूप में स्थापित
हुए। नवरात्रि पूजन के अंतिम दिन भक्त और योगी साधक इन्हीं माता सिद्धिदात्री की शास्त्रीय विधि-विधान से पूजा करते हैं। माता सिद्धिदात्री चतुर्भुज और
सिंहवाहिनी हैं। गति के समय वे सिंह पर और अचला रुप
में कमल पुष्प के आसन पर बैठती हैं। माता के दाहिनी
ओर के नीचे वाले हाथ में चक्र,ऊपर वाले दाहिने हाथ में
गदा रहती है। बाईं ओर के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्प रहता है। कहा जाता है कि केवल नवरात्रों के नवें दिन भी कोई एकाग्रता और निष्ठा
से इनकी विधिवत पूजा करे तो उसे सभी सिद्धियां प्राप्त
हो जाती हैं। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए असंभव नहीं
रहता और ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य
उसमें आजाती है।

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