
इलाहाबाद। ट्रांसजेंडर्स के अधिकारों के लिए काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता और किन्नर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी सुप्रीम कोर्ट में धारा-377 की वैधता को चुनौती वाली याचिकाओं पर हुई सुनवाई से खुश हैं.
ट्रांसजेंडर सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी
‘हम किन्नर लोग 70 जाति की रोटी खाते हैं. हमारे लिए हिन्दू भी उतना ही है, मुसलमान भी, सिख भी और ईसाई भी. हम समाज की खुशी के लिए हमेशा सोचते हैं. हमारे अंदर नफरत कहां से आएगी.नफरत क्या चीज है, ये हमसे बेहतर कोई नहीं जानता क्योंकि सबसे ज्यादा हम ही शिकार हुए हैं.कटाक्ष भरी नजरें कैसे चुभती हैं, ये हमसे ज्यादा अच्छे से कौन बता सकता है. जब अपनों ने ही हमें बेगैरत करके अपनी जिंदगी से निकाल दिया. अब आगे क्या बोलें? लेकिन सुप्रीम कोर्ट से एक उम्मीद जगी है.’
ये बातें ट्रांसजेंडर्स के अधिकारों के लिए काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता और किन्नर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने कहीं. 1999 से इस लड़ाई को लड़ रहीं लक्ष्मी सुप्रीम कोर्ट में धारा-377 की वैधता को चुनौती वाली याचिकाओं पर हुई सुनवाई से खुश हैं.

लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी 1999 से ट्रांसजेंडर के अधिकारों के लिए लड़ रही हैं.
वे कहती हैं कि आज लोग धर्म और संस्कृति के नाम पर ढकोसला फैलाते हैं. यह सब सिर्फ पावर गेम है. जबकि सबसे ज्यादा आधुनिक धर्म सनातन धर्म ही है. यहां हर एक चीज को सेलिब्रेट किया गया है. सनातन धर्म में सब लैंगिकता से परे हैं. अगर संविधान को भी कोई ढंग से पढ़े तो सिर्फ लैंगिक आधार पर कोई अपराधी नहीं हो जाता है.
हम समाज में एक दाग की तरह हैं. यही वजह है कि ये समाज ट्रांसजेंडर्स के सामने अनेकों जटिलताएं पैदा करता है. हम लोग ब्लैकमेलिंग, आत्महत्या, शोषण, भेदभाव, भीड़ द्वारा उड़ाए जाने वाले मजाक को आए दिन झेलते हैं. हमें पुलिस से लेकर गुंडे तक टॉर्चर करते हैं. इसीलिए चाहते हैं कि कानूनन ये अपराध का ठप्पा हमारे ऊपर से हट जाए. जब कानून लागू हो जाएगा तो सामाजिक स्तर पर भी दशा सुधरने की उम्मीद है.
जेंडर के बारे में हम एक समाज के तौर पर काफी सतही सोचते हैं.
अभी तक सरकारों के पास ट्रांसजेंडर्स की जनसंख्या का ही कोई आंकड़ा नहीं है. कुछ तो आकलन होना चाहिए. सरकारों को ये तो पता चले कि आखिर ऐसे लोगों की कितनी जनसंख्या हैं. भारतीय संविधान में भी हमें जीने का अधिकार है. फिर अपराधी क्यों?
मैं चाहे एक हूं या करोड़ हूं. मेरे आत्मसम्मान का संरक्षण्ा संविधान करता है. ये अछूत की बीमारी तो नहीं है. अरे जिनको ये हक मिलेगा वो भी पढ़े लिखे लोग है. वो नंगे हाेकर नाचने के लिए ये हक नहीं मांग रहे. वो मनुष्य होकर ये हक मांग रहे हैं. ताकि हिकारत भरी नजरों से दूर रहें. वो स्वयं की नजरों में मनुष्य बने रहें और स्वयं की नजरों में ये पूर्ण रूप से समझें कि वो भारतीय हैं.
laxmi narayan tripathi
लक्ष्मी का कहना है ,’जिस तरह से बलात्कार हो रहे हैं अौर नैतिकता की दुहाई देने वाले लोग हैं वो लैंगिकता के मुद्दों पर इतनी राजनीति खेलते हैं. ये लोग भ्रम फैलाते हैं. महिलाओं के हक की लड़ाई तो आजतक जारी है. महिला आरक्षण बिल अभी तक लंबित है. आठ-आठ महीने की बच्चियों का दुष्कर्म आज तक हो रहा है. लड़ाई तो कभी बंद ही न होगी. समाज में सोचने का ढंग ही लैंगिकता पर निर्भर है. नारी के ऊपर इतना अत्याचार है. मैं ये सोच रही हूं कि आगे क्या करें. ‘


