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भागवत पुराण का रस आजीवन आत्मसात करना चाहिए- व्यास श्रवण नंद जी

(अनुराग शुक्ला ) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। ज्योतिषपीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य ब्रह्मलीन स्वामी शांतानंद सरस्वती जी की स्मृति में अलोपीबाग स्थित ब्रह्म निवास आश्रम में आयोजित नौ दिवसीय आराधना महोत्सव में बोलते हुए कथा व्यास स्वामी श्रवणनंद जी ने बताया की श्रीमद् भागवत महापुराण की कथा केवल श्रवण नहीं करना चाहिए बल्कि इसको आत्मसात करना चाहिए l उन्होंने कहा कि मानव जीवन में दो बातें प्रमुख रूप से होते हैं भोजन और भजन। भोजन की तो मात्रा होती है किंतु भजन में मात्रा नहीं होती है इसलिए भजन खूब करना चाहिए। भागवत को सुनने की इच्छा मात्र से भगवान भक्त के ह्रदय में आकर रहने लगते हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण सुनने वाले को भगवान अपने धाम में स्थान देते हैं। कथा सुनाने वालों के लिए भी पूजा व्यास जी ने कुछ आचार संहिता बताया। नारद जी वक्ता है और व्यास जी श्रोता है। दोनों ही भगवान है। व्यास जी लोक कल्याण के लिए श्रीमद् भागवत महापुराण कथा सुनना चाहते हैं। सुखदेव जी आत्म निष्ठ हैं। उनके हृदय में करुणा है। स्कंद पुराण में श्रोता एवं वक्ता के कार्य कर्तव्य एवं लक्षण बताए गए हैं। श्रीमद् भागवत महापुराण कथा सुनने के लिए किसी विद्वान ज्योतिषी से तिथि व समय निर्धारित करा लेना चाहिए। आराधना महोत्सव में बोलते हुए पूज्य श्रीमज्योतिषपीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती जी महाराज ने बताया कि समाज एवं संत का कर्तव्य है कि सनातन धर्म की रक्षा के लिए सदैव प्रयास करें। स्वामी जी ने बताया कि लगभग 2600 वर्ष पहले अवतरित भगवान आदि शंकराचार्य ने अपने तप-ज्ञान-शास्त्र से शास्त्रार्थ करके सनातन वैदिक धर्म की रक्षा एवं प्रचार किया। संपूर्ण भारत में चारों दिशाओं में एक एक पीठ (विद्यालय) की स्थापना किया। उनके संचालन के लिए उनका एक एक आचार्य मनोनीत जो देश की चारों दिशाओं सनातन वैदिक धर्म का प्रचार प्रसार करेंगे। उन्हीं 4 पीठों में 1 पीठ है श्रीमज्योतिषपीठ 1941 ईस्वी में परम तपस्वी ज्ञानी सिद्ध संत श्री ब्रह्मानंद जी सरस्वती ही श्रीमज्योतिषपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य के रूप में पीठासीन हुए। उनके बाद स्वामी शांतानंद सरस्वती फिर स्वामी विष्णुदेवानंद सरस्वती जी महाराज तथा उनके पश्चात मेरा पीठारोहण ज्योतिषपीठाधीश्वर के रूप में हुआ। इन्हीं पूर्वाचार्यों गुरुओं की स्मृति में यह आराधना महोत्सव प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है।उक्त अवसर पर प्रमुख रूप से दंडी स्वामी विनोदानंद जी, आचार्य शिवार्चन उपाध्याय जी (पूर्व प्रधानाचार्य), ब्रह्मचारी आत्मानंद जी, ब्रह्मचारी विशुद्धानंद जी, पंडित विपिन मिश्रा जी, ब्रह्मचारी जितेंद्रानंद जी, पंडित मनीष जी, स्वामी अदैतानंद जी, आचार्य भगवान दास जी, आचार्य संतोष त्रिपाठी, आचार्य श्री राम नारायण जी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु में पुरुष एवं महिलाएं उपस्थित रही।

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