लोकसभा हो या विधानसभा…..!!
चुनाव के समय नेताओं द्वारा दलबदल किया जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया बन चुकी है किंतु इस तरह के कृत्य से सबसे ज्यादा नुकसान यदि किसी का होता है तो वह राजनीतिक दलों के उन जमीनी और मूल कार्यकर्ताओं का होता है जो इस आशा और विश्वास के साथ पार्टी की विचारधारा और सिद्धांतों को लेकर संघर्ष करते हैं कि जब हमारी सरकार आएगी तो अपने राजनीतिक एजेंडे को धरातल पर उतारने के साथ ही साथ कुछ हम कार्यकर्ताओं के लिए भी करेगी, हमें भी शासन सत्ता का अंग बनाएगी,
किंतु जब चुनाव के समय सत्ता की ओर अग्रसर दलों में बाहरी नेता आकर, चुनाव लड़कर सांसद, विधायक, मंत्री बनने के साथ ही विभिन्न राजनैतिक मनोनयन वाले पदों पर मनोनीत हो जाते हैं तो मूल कार्यकर्ताओं का हक मारा जाता है, हक उस समय भी मारा जाता है जब दल बदल कर आए हुए नेताओं के साथ उनके समर्थक भी उनके साथ आते हैं और दल बदल कर आया हुआ नेता जब पार्टी के मूल कार्यकर्ताओं से यह कहता है कि सर्वप्रथम वह अपने साथ आए हुए समर्थकों के लिए कुछ करेगा उसके बाद ही कुछ गुंजाइश बचेगी तो वह दल के कार्यकर्ताओं के लिए करेगा क्योंकि उसके समर्थक उसके लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह जिस भी दल में जाते हैं समर्थक उनके साथ – साथ जाता है ऐसे में उस कार्यकर्ता के दिल और दिमाग पर क्या असर पड़ता होगा जो इस आस में अब तक पार्टी के लिए कार्य करता रहा कि सरकार में उसके भी दिन बहुरेंगे I
जब पूरा का पूरा कार्यकाल समाप्त हो जाए और वह कार्यकर्ता कुछ न पाए और साथ ही उसे घर- परिवार -नाते -रिश्तेदार- दोस्त -यारों से यह ताना सुनने को मिले कि इतने दिन तुम पार्टी के लिए कार्य किए तुम्हारे दल की सरकार भी आई और तुम्हें क्या मिला …? तो सोचिए उस दल के मूल कार्यकर्ता के दिल और दिमाग पर क्या गुजरती होगी, यह एक विचारणीय प्रश्न है ,सत्ता के चकाचौंध से ऊपर उठकर ऐसे कार्यकर्ताओं के विषय में भी चिंतन करना, मनन करना सभी दलों के वरिष्ठ नेताओं के लिए आवश्यक है I आज बस इतना ही…!!


